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उत्तर प्रदेश ग़ाजियाबाद

अभी तो मेयर सीट को लेकर आरक्षण का नहीं है कोई इफ या बट

लेकिन दावेदारों ने बजा रखा है पूरी तरह से धूल में लठ
वरिष्ठ संवाददाता (करंट क्राइम)
गाजियाबाद। पालिकाओं का सीमा विस्तार क्या हुआ कि क्रेडिट जंग ही शुरू हो गयी। कोई कहे कि सांसद अगर रूचि नहीं लेते तो बात बनती नहीं। 12 भगवा चेहरे कहें कि अगर हम लैटर नहीं लिखते तो ये मैटर ही कन्सीडर नहीं होता। भगवा फेस भी ऐसे कि जिनका राजनीति में बेस है। राज्यसभा सांसद के हस्ताक्षर तो एमएलसी के सिगनेचर कहीं महानगर अध्यक्ष के साईन तो बाल्मिकी जी ने भी मामला किया था फाईन। अब जो कहे सो कहे लेकिन मुरादनगर में तो जनप्रतिनिधि के पति ने ही नक्शा खोल लिया। बता दिया कि कुछ भी कहो लेकिन लोकसभा से लेकर लैटर वालों को ईलाके का भूगोल नहीं पता था और हमने तो इतने दिन पहले ये पत्र लिख दिया था। सीमा विस्तार के बाद ये कितना फायदेमंद होगा ये अभी चुनाव का नतीजा बतायेगा लेकिन दावेदारों में खुशी की लहर क्यों है ये पता नहीं।
वहीं मेयर चुनाव को लेकर भी भाग दौड़ शुरू हो चुकी है। कोई संघ वालों के यहां तो कोई दिल्ली वालों के यहां है। ये ही सीन पालिका चेयरमैन के लिए हो रहा है। अभी ये नहीं पता है कि सीट रिजर्व होगी या फिर पार्टी किसी और चेहरे को टिकट के लिए डिजर्व करेगी। पार्टी टिकट रिपीट करेगी या चेंज करेगी। सीट का आरक्षण होगा या नहीं होगा। लेकिन दावेदारों ने धूल में लठ बजा रखा है। एक एक सीट पर बीस-बीस दावेदारों का एक मेला है। धूल में लठ का छठ फूल वालों में ज्यादा चल रहा है। भाजपा वाले दावेदार अपने ही सिटिंग अध्यक्ष में साईलेंट गले से कमियां गिनवा रहे हैं। उसके कराये कामों में कमियां तलाश रहे हैं। बोर्ड लग गये हैं, बधाई शुरू हो गयी है और जिन्हें चुनाव लड़ना है वो अपनी दावेदारी को कमजोर देखते हुए समाजसेवी हो गये हैं। उन्हें जनसेवा करनी है तो करनी है वहीं इसके लिए भाजपा से बगावत करनी पड़े।
वो समाजसेवी बनकर बोर्डिंग बैनर पर आ गये हैं। दावेदारी का लठ पटक रहा है और मेयर दावेदार से लेकर पालिका चेयरमैन वाले नेता लखनऊ से लेकर दिल्ली तक रोज सम्पर्क साध रहे हैं। दावेदारी की इस कहानी का सबसे रोचक मोड़ यही है कि अभी रिजर्वेशन का पता नहीं है लेकिन इलेक्शन को लेकर पूरी टेंशन यहां के दावेदारों ने ले ली है। सीट रिजर्व होगी या नहीं होगी इसका इंतजार दावेदारों से नहीं हो रहा है। सीट पुरूष रहेगी या महिला रहेगी ये बाद में देखा जायेगा पहले खुद को पार्षद समझकर काम करना होगा। जब तक चुनाव आयोग से कोई घोषणा नहीं होगी तब तक दावेदारों ने भी धूल में लठ बजा रखा है। आपस में हाथ मिला लिये हैं कि अगर सीट ओबीसी हुई तो तुम लड़ लेना और जनरल हुई तो हम लड़ लेंगे। सीट दलित आरक्षित हुई तो मेरा कैन्डिडेट ये रहेगा और यदि महिला के नाम सीट आती है तो फिर भाभी जी के लिए हम सब मिलकर टिकट मांगेगे।

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