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सियासत की भगवा भूमि पर क्यों है महिला पॉलिटिक्स खामोश

सीट आरक्षित और मोर्चे के बिना क्यों नही मिलता पारितोष
वरिष्ठ संवाददाता (करंट क्राइम)

गाजियाबाद। राजनीति की बात चलती है तो यहां आधी आबादी की बात आती है। आधी आबादी यानि महिला शक्ति की बात होती है। राजनीति भले ही जातीय और धर्म के समीकरण पर सधती हो मगर कानून तो आधी आबादी को राजनीति में आरक्षण का अधिकार देता है। 33 प्रतिशत टिकट महिलाओं को दिए जाते हैं लेकिन विकट सीन ये है कि इस आरक्षण में भी भाई-भतीजावाद की सेंध लगी है। जब महिला को टिकट देने की बात आती है तो बड़े नेता की पत्नी सबसे कर्मठ कार्यकर्ता बनकर सामने आ जाती है। सीट महिला आरक्षित हो जाती है और नेता की पत्नी चुनाव जीतकर जनसेवक हो जाती है। सवाल ये है कि गाजियाबाद की भगवा भूमि पर महिला सियासत का सुर इतना खामोश क्यों है। महिलायें यदि राजनीति में मेहनत करती हैं तो उन्हें मेहनत का ईनाम क्यों नही मिलता है। इक्का-दुक्का अपवाद के मामले छोड़ दें तो सीन ये है कि महिला को टिकट मिलता ही तब है जब सीट ही महिला आरक्षित हो जाती है। कभी ऐसा नही होता कि सीट पुरूष के लिए हो और यहां महिला को टिकट मिल जाये।

आरक्षित सीट पर परिवार का चेहरा बनकर जीती हैं ये महिलायें

बात अगर गाजियाबाद की करें तो यहां महिला राजनीति में एक दशक में बहुत कुछ बदला है लेकिन महिला पॉलिटिक्स का सीन नहीं बदला है। जब मेयर सीट पहली बार महिला आरक्षित हुई तो यहां सीट पर भाजपा ने दमयंती गोयल को मैदान में उतारा। दमयंती गोयल संघ पृष्ठभूमि परिवार से थीं लेकिन भाजपा की सक्रिय महिला राजनीति का चेहरा नही थीं। सपा ने यहां से हरीश नागपाल की पत्नी अंजुला नागपाल को टिकट दिया।अंजुला नागपाल राजनीति की एबीसीडी नहीं जानती थीं। चुनाव हारने के बाद वह कभी राजनीति में दिखाई भी नही दीं। कांग्रेस ने यहां से पारस शर्मा को टिकट दिया। कांग्रेस नेता पवन शर्मा की पत्नी पारस शर्मा ना पहले एक्टिव थीं और चुनाव हारने के बाद किसी ने उन्हें राजनीति में नही देखा। बसपा ने अपने नेता जलालुद्दीन सिद्दकी की पत्नी हसीना बेगम को टिकट दिया। चुनाव खत्म और हसीना बेगम घर गृहस्थी में बिजी। इसके बाद तेलूराम काम्बोज मेयर बने फिर आशु वर्मा मेयर रहे और सीट महिला आरक्षित हुई। भाजपा ने जरूर यहां अपनी कार्यकर्ता आशा शर्मा को टिकट दिया मगर सीन अन्य दलों में टिकट पत्नी को और चेहरा पति वाला रहा। समाजवादी पार्टी ने यहां अभिषेक गर्ग की पत्नी राशि गर्ग को टिकट दिया। राशि गर्ग इस चुनाव से पहले कभी भी महिला पॉलिटिक्स का चेहरा नही रहीं। बसपा ने यहां मुन्नी देवी को उम्मीदवार बनाया। मुन्नी देवी को बसपा वाले भी नही जानते थे और उनका परिचय ये था कि वह बसपा नेता सतपाल चौधरी की पत्नी हैं। कांग्रेस के टिकट पर डॉली शर्मा चुनाव लड़ी। डॉली शर्मा का परिचय ये था कि वह कांग्रेस के महानगर अध्यक्ष नरेन्द्र भारद्वाज की पुत्री हैं। बात शहर से लेकर देहात तक यही रही है। खोड़ा नगर पालिका चेयरमैन रीना भाटी को पति की हत्या के बाद सिम्पैथी टिकट मिला और वह चुनाव जीती। यहां पर लोनी की चेयरमैन रंजीता धामा भी पूर्व चेयरमैन मनोज धामा की पत्नी हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष लक्ष्मी मावी भी भाजपा नेता पवन मावी की पत्नी हैं।

कई वार्डों में लोग नही जानते अपनी महिला पार्षद को

देहात की बात छोड़ो दिल्ली से सटा गाजियाबाद में कई वार्ड ऐसे हैं जहां लोग अपनी पार्षद को नहीं जानते। यहां सरकारी कागजों से लेकर वार्ड के होर्डिंग पर मोबाईल नम्बर तक महिला पार्षद के पति का लिखा होता है। निगम अधिकारियों के कमरे में ये पार्षद पति ही फाईल लेकर विकास कराते हैं। हाल ही में लखनऊ में नगर विकास के बड़े अधिकारी के दरवाजे पर फाईल लेकर एक भाजपा पार्षद के पति ही खड़े थे। कैला भट्टा क्षेत्र की एक महिला पार्षद का चेहरा किसी ने नही देखा है। फोन नम्बर से लेकर बयान देने तक इनके पति आगे रहते हैं। कांग्रेस की पार्षद का नाम कोई नही जानता और उनके पति सब जगह मिलेंगे। सवाल ये है कि जब पुरूषों को ही चुनाव लड़ना और जीतना होता है तो फिर महिला आरक्षण की ये फार्मल्टी बंद होनी चाहिए। पार्टी यह नियम बना दें कि कम से कम 10 साल पुरानी कार्यकर्ता को टिकट मिलेगा। किसी भी पुरूष नेता की पत्नी को टिकट नही मिलेगा। बेटी को टिकट नही मिलेगा। पुत्र वधु को टिकट नही मिलेगा। टिकट कार्यकर्ता का है और कार्यकर्ता को ही मिलेगा।

भगवागढ़ में कब होगी इन महिला चेहरों पर सियासी कृपा

बात यदि महिला राजनीति की करें तो गाजियाबाद में भाजपा इस मामले में नम्बर वन है। यहां से मंजू सिवाच विधायक हैं। आशा शर्मा मेयर हैं। रीना भाटी, रंजीता धामा नगर पालिका चेयरमैन हैं। लक्ष्मी मावी जिला पंचायत अध्यक्ष हैं और कई वार्डों में महिला पार्षद भी हैं। लेकिन सवाल वही है कि भगवा गढ़ में कई महिला नेता ऐसी हैं जो लगातार मेहनत करती हैं। पार्टी के लिए कर्मठ हैं और अब सवाल ये है कि इन चेहरों पर भी सियासी कृपा कब होगी। अर्चना सिंह और सुनीता नागपाल नामित पार्षद बन गर्इं मगर मेहनत वाले शिजरे में तो कई नाम आते हैं। कई चेहरे हैं जो मंडल से महानगर में आने चाहिए इनमें वसुंधरा मंडल की पूजा शर्मा का नाम मेहनती चेहरों में गिना जाता है। सौम्यता और शिक्षित चेहरों में रनीता सिंह की गिनती होती है। प्रीति चंद्रा राय के पास क्षेत्रीय पद रहा है और ये वो चेहरे हैं जो और अधिक के लिए योग्यता रखते हैं। हिण्डन पार की बात करें तो कुसुम शर्मा यहां ऐसा नाम हैं जो एक समय मेयर की दावेदारी में रहा है। बात पार्टी के काम की हो तो मास्क सिलने से लेकर पार्टी के दिए गये सभी आयामों में टास्क पूरा किया है। पार्टी को इस चेहरे के लिए भी सोचना चाहिए। यहां पर यदि बात मेहनत की होगी तो नीरू शर्मा के बिना ये जिक्र अधूरा है। सदस्यता अभियान में वह नम्बर वन रही थीं। उनके पति संघ पृष्ठ भूमि से हैं। इसके अलावा पूनम कौशिक को उनकी मेहनत का फल कब मिलेगा यह भी एक सवाल है। इस लिस्ट में आशा सिंह, ज्योति चौहान,साक्षी नारंग, तारा जोशी, सिम्पी सिंह सहित कई नाम आते हैं। सवाल यही है कि इन महिला चेहरों को कब उनकी मेहनत का ईनाम मिलेगा। सरकार भी अब दो साल की रह गयी है और ऐसे में इन चेहरों पर सियासी कृपा कब होगी, इन चेहरों ने अपने दम पर अपनी राजनीति की इबारत लिखी है।

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