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कैराना उपचुनाव से क्यों दूर है बसपा का हाथी

= कांग्रेस के हाथ ने भी साथ देने के नाम पर साधी खामोशी = कैराना उपचुनाव में रालोद वाले भी पहुंचे और सपा वाले भी
गाजियाबाद (करंट क्राइम)। गोरखपुर और फूलपुर नतीजों के बाद से गठबंधन धर्म की उम्मीदें परवान पर हैं। फूलपुर और गोरखपुर के बाद अब उपचुनाव में कैराना वो सीट है, जहां भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर है। विधानसभा चुनावों में कैराना में ही पलायन के मुद्दे पर भाजपा ने माहौल बनाया था। सभी जिलों के संगठन नेताओं को आदेश दिया गया था कि अपने-अपने जिले में पलायन करने वाले लोगों की सूची बनाये। कैराना में भाजपा को लहर में भी मतदाताओं के कहर का सामना करना पड़ गया था। लहर के बाद भी यहां उसकी उम्मीदवार मृगांका सिंह चुनाव हार गर्इं थीं। इसके बाद यहां से लोकसभा सांसद रहे हुकुम सिंह का निधन हो गया। अब उनके निधन के बाद भाजपा ने यहां से दिवंगत हुकुम स्ािंह की पुत्री मृगांका सिंह को ही चुनाव मैदान में उतारा है। वहीं दूसरी तरफ यहां से रालोद के टिकट पर तब्बसुम हसन को गठबंधन उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारा है। तब्ब्सुम हसन कैराना की राजनीति का जाना पहचाना चेहरा हैं। वह यहां से लोकसभा सांसद रह चुके मरहूम मनव्वर हसन की पत्नी हैं। उपचुनाव भले ही कैराना में है लेकिन सियासत ने प्रचार के लिये भरोसा गाजियाबाद के नेताओं पर किया है। भाजपा ने क्षेत्रीय महामंत्री और गाजियाबाद भाजपा के पूर्व महानगर अध्यक्ष अशोक मोंगा को प्रचार की कमान सौंपी है। विधायक सुनील शर्मा से लेकर अजीतपाल त्यागी तक कैराना में प्रचार कर रहे हैं। यूथ नेताओं की गाजियाबाद वाली टोली कैराना में ही डेरा डाले पड़ी है। सपा ने भी गाजियाबाद के वर्तमान पदाधिकारियों से लेकर पूर्व पदाधिकारियों की ड्यूटी कैराना चुनाव प्रचार में लगा दी है। मौजूदा जिलाध्यक्ष सुरेंद्र कुमार मुन्नी से लेकर पूर्व जिलाध्यक्ष राशिद मलिक से लेकर पूर्व महानगर अध्यक्षों की ड्यूटी लगाई गई है। सपा के नेता गाजियाबाद से पहुंचकर कैराना में रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ रही तब्बसुम हसन के पक्ष में चुनाव प्रचार कर भी रहे हैं। रालोद के अजयवीर चौधरी से लेकर रामानंद गोयल तक कैराना में डेरा डाले हुए हैं। रालोद के महानगर अध्यक्ष रविंद्र चौहान से लेकर प्रदेश प्रवक्ता इन्द्रजीत सिंह टीटू भी कैराना के मैदान में हैं। यह चुनाव गठबंधन के लिये भी अहम माना जा रहा है और भाजपा के लिये भी। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तो इस सीट पर अपनी उम्मीदवार को रालोद के टिकट पर मैदान में उतारा है। यहां गठबंधन धर्म के तहत ना तो बसपा ने अपना उम्मीदवार उतारा और ना ही कांग्रेस ने किसी उम्मीदवार को मैदान में उतारा है। कैराना उपचुनाव वेस्ट यूपी मेें गठबंधन के जनाधार का लिटमस टेस्ट भी साबित होगा। यह भाजपा के लिये भी इस बात का रिपोर्ट कार्ड होगा कि सूबे में योगी सरकार के कामों से जनता कितनी खुश है।
कैराना को लेकर बसपा सुुप्रीमों कर सकती हैं कोई बड़ा ऐलान
जिस तरह गोरखपुर और फूलपुर में सपा के उम्मीदवार को बसपा के नीले हाथी ने ताकत दी थी, वह सीन फिलहाल कैराना में नहीं दिख रहा है। गाजियाबाद के सपा नेताओं को जिस तरह सपा ने गठबंधन को ताकत देने के लिये कैराना भेजा है, वैसे ही अभी तक गाजियाबाद के किसी भी बसपा नेता की ड्यूटी कैराना में नहीं लगी है। सवाल सियासी गलियारों में ही उठ रहा है कि कैराना चुनाव के लिये अभी तक बसपा सुप्रीमो मायावती ने गाजियाबाद के किसी बसपा नेता को इशारा क्यों नहीं किया है। कैराना उपचुनाव को लेकर अभी तक मायावती का कोई बयान भी नहीं आया है। किसी स्थानीय बसपा नेता को संगठन की ओर से कोई आदेश निर्देश भी नहीं मिला है। कैराना उपचुनाव को लेकर हाथी की खामोशी किस बात के संकेत दे रही है। सूत्र बता रहे हैं कि बसपा की एक मीटिंग हुई है और इस मीटिंग के नतीजों का असर जल्द ही देखने को मिलेगा। सूत्र बता रहे हैं कि कैराना को लेकर जल्द ही बसपा सुप्रीमो मायावती कोई बड़ा ऐलान कर सकती है। यह भी सब जानते हैं कि मायावती का ऐलान उनकी पार्टी के कैडर वोटर एक फतवे के रूप में लेते हैं और इसका व्यापक असर होता है। जब गाजियाबाद के सपा नेताओं से लेकर भाजपा नेताओं की पूरी फौज गाजियाबाद से कैराना पहुंचकर चुनाव लड़ा रही है तब बसपा अपने किसी नेता को कैराना क्यों नहीं भेज रही है। अब कयास इस बात को लेकर लगाये जा रहे हैं कि बसपा कैराना उपचुनाव में गठबंधन धर्म के तहत रालोद को समर्थन देगी या फिर अपने कैडर वोट को समर्थन देने का इशारा करेगी। अब यदि बसपा समर्थन देगी तो इसके अलग संदेश हंै और यदि केवल इशारा दिया तो फिर इशारे का इशारा किधर होगा और इसके क्या मायने होंगे,इसको लेकर राजनीतिक जानकार कयास लगा रहे हैं। बसपा यदि रालोद गठबंधन के उम्मीदवार के साथ खुलकर मैदान में आती है तो यहां सियासी तस्वीर तेजी से बदलेगी। लेकिन अभी तक ऐसा हुआ नहीं है और कैराना पहुंचकर चुनाव प्रचार करने का इशारा या आदेश गाजियाबाद के किसी बसपा नेता को नहीं मिला है। गाजियाबाद के बसपा नेताओं में पूर्व विधायक सुरेश बंसल और वेस्ट यूपी प्रभारी शमसुद्दीन राईन गाजियाबाद में ही रहते हैं और इसके अलावा संगठन के अन्य नेताओं को अभी तक कैराना को लेकर कोई दिशा निर्देश नही मिले हैं। सपा जोरशोर से मैदान में है लेकिन बसपा के हाथी का साइलेंट मोड सबकी समझ से बाहर है।
कांगे्रस का हाथ भी साथ के नाम पर साइलेंट
कैराना चुनाव के गाजियाबाद कनेक्शन पर कांग्रेस का हाथ भी साइलेंट मोड पर है। कांग्रेस गठबंधन को सहमति भी दे रही है लेकिन समर्थन वाले लहजे में दिख नहीं रही है। कांग्रेस ने कैराना में उम्मीदवार भी नहीं उतारा है और गठबंधन की उम्मीदों के अनुसार मैदान मेंं भी नहीं आ रही है। कांगे्रस कैराना उपचुनाव में वेट एंड वाच की स्थिति में नजर आ रही है। गाजियाबाद से किसी कांग्रेस नेता की ड्यूटी कैराना में इस बात के लिये नहीं लगाई गयी है कि वह जाकर कैराना में चुनाव प्रचार करें। कांग्र्रेस के पास गाजियाबाद में राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर के पदाधिकारियों की एक पूरी फौज है। गाजियाबाद के कांग्रेसी नेताओं में कई एआईसीसी और कई पीसीसी सदस्य हैं। कांग्रेस के पूर्व सांसद सुरेंद्र प्रकाश गोयल,पूर्व मंत्री सतीश शर्मा,बिजेंद्र यादव,विजय चौधरी सहित कई नेता ऐसे हैं जिनका अपनी बिरादरी के लोगों मेंं असर है। बेहतर वक्ता हैं और गठबंधन के लिये माहौल बना सकते हैं। लेकिन कांगे्रस ने गाजियाबाद के किसी नेता को अभी तक कैराना जाकर चुनाव प्रचार करने के लिये नहीं कहा है। कांग्रेस भले ही कैराना में मैदान में नहीं है लेकिन गठबंधन धर्म के तहत रालोद उम्मीदवार के साथ मैदान में दिख तो सकती है। वैसे भी कैराना चुनाव को गठबंधन के बड़े प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा है। लोकसभा चुनाव भी आ ही रहा है और यहीं से इस बात की तस्वीर क्लियर होगी कि गठबंधन को कितनी सफलता वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में मिलने जा रही है। कांग्रेस के किसी गाजियाबादी नेता के दर्शन अभी तक कैराना में नहीं हुए हैं और उसके बड़े नेता फिलहाल कर्नाटक में बिजी हैं।

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