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ब्राह्मण राजनीति को किसने दी है आॅक्सीजन

वरिष्ठ संवाददाता (करंट क्राइम)

गाजियाबाद। एक लंबे समय के बाद ऐसा हुआ है कि जब सियासत ने ब्राह्मण की अहमियत समझ ली है। अब संगठन से लेकर टिकट तक सभी राजनैतिक दल ब्राह्मण वर्ग को प्रतिनिधित्व दे रहे है। एक समय था जब किसी भी राजनैतिक दल में संगठन के नाम पर किसी ब्राह्मण को पद नहीं मिलता था। अब गाजियाबाद में राजनीति में ब्राह्मण वर्ग फिर से लौटा है। अब सवाल यह है कि ब्राह्मण राजनीति को यहां की सियासत में आॅक्सीजन किसने दी है। कुछ का कहना है कि विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों ने अपनी पकड़ दिखाई और उसके बाद ही राजनैतिक दलों की समझ में आई है। यहां पूर्व विधायक केके शर्मा चुनाव लड़े। जितना कमजोर उन्हें माना जा रहा था वह उतने कमजोर थे नहीं। उन्होंने मजबूती से चुनाव लड़ा और यदि वह मजबूत नहीं होते तो अतुल गर्ग शहर विधायक नहीं बन पाते। भाजपा ने सुनील शर्मा को टिकट दिया और सुनील शर्मा चुनाव जीतकर विधायक बन गए।
ब्राह्मण राजनीति में सही मायनों में बूम लाने का श्रेय दो महिला ब्राह्मण नेताओं को जाता है। इनके आने के बाद ही सियासत में ब्राह्मण क्रांति आई है। कांग्रेस की डॉली शर्मा और भाजपा की आशा शर्मा ने जिस हिसाब से चुनावी जंग लड़ी उसने यहां ब्राह्मण राजनीति का एक युग ही शुरू कर दिया। जिस डॉली शर्मा को खुद कांग्रेस के नेता कमजोर मान रहे थे, उस डॉली शर्मा ने युवा ब्राह्मण चेहरे के रूप में चुनाव की जंग इस अंदाज में लड़ी कि यहां पॉलिटिक्ल वेंटीलेटर पर पड़ी कांग्रेस जिंदा हो गई।
भाषण देने के अंदाज से लेकर चुनाव में टीवी चैनल पर डिबेट में डॉली शर्मा के अंदाज ने सबको आकर्षित किया। डॉली शर्मा भले ही चुनाव हार गई, लेकिन उन्होंने भाजपा की आंधी जैसे माहौल में एक लाख से अधिक वोट लेकर यह साबित कर दिया कि लहर के विपरीत जाकर चुनाव कैसे लड़ा जाता है। आज छात्र संघ से लेकर किसान आंदोलन तक डॉली शर्मा सक्रिय है और वह कांग्रेस का एक ऐसा चेहरा बनकर सामने आई है, जिन्हें युवा वर्ग अपनी राजनीति में स्थान दे रहा है। भाजपा में आशा शर्मा को जब टिकट मिला तो कुछ लोग इसे कमजोर टिकट मान रहे थे। तब एक वर्ग का मानना था कि वैश्य समाज इस बार साइकिल पर चला जाएगा। कुछ यह तर्क दे रहे थे कि आशा शर्मा 15 वर्ष से राजनीति में सक्रिय ही नहीं है। लेकिन जब आशा शर्मा चुनाव मैदान में उतरी तो उन्होंने अपने ही अंदाज में चुनाव प्रचार को भगवा रंग दिया। उनकी बोलने की क्षमता और ब्राह्मण समाज में उनकी पकड़ का मुलाहिजा चुनाव नतीजे के बाद हो गया।
आशा शर्मा केवल चुनाव नहीं जीती है, बल्कि उत्तर प्रदेश में उन्होंने रिकॉर्ड वोटों से जीत हासिल कर कीर्तिमान बनाया है। युवा नेताओं में संजीव शर्मा ने अपनी अलग पहचान बनाई है। अजय शर्मा भाजपा के महानगर अध्यक्ष रहते हुए भले ही राजनगर प्रकरण का शिकार हो गए लेकिन संगठन अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने भी रिकॉर्ड कायम किया है। उनके महानगर अध्यक्ष के कार्यकाल में ही भाजपा यहां सभी सीटों पर जीती है और निकाय व निगम चुनाव में हर सीट पर कमल खिल गया है। भाजपा निगम के सदन में 57 सीटों के साथ आधे में हम और आधे में सब के गणित के साथ मौजूद है। कांग्रेस में सक्रियता के मामले में पूर्व मंत्री सतीश शर्मा ने मंडोला किसानों का मुद्दा ऐसा उठाया कि प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर को यहां आकर क्रांतिकारी तेवर दिखाने पड़े।
अब सपा ने संगठन के मामले में ब्राह्मणों की अहमियत मान ली है। यहां सुरेंद्र कुमार मुन्नी जैसे नेता को जिलाध्यक्ष बनाया गया है। सुरेंद्र कुमार मुन्नी ब्राह्मण समाज के सर्व स्वीकृत नेता के रूप में जाने जाते हैं। माना जा रहा है कि अब ब्राह्मण राजनीति का युग शुरू हो गया है। सभी दलों के बड़े नेता मानकर चल रहे हैं कि ब्राह्मण वर्ग को इग्नोर करके राजनीति में बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की जा सकती।

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