भटकती युवा पीढ़ी और गुनाहगार हम

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समाज का युवा किस दिशा में चल रहा है यह अब एक बड़े चिंतन का रूप लेता जा रहा है। रविवार के एक दैनिक अखबार के अंक में एक खबर को पढ़कर यह अहसास हुआ कि आज की युवा पीढ़ी बड़े भटकाव की ओर है और माता-पिता, समाज के जिम्मेदार लोग और कहीं न कहीं स्कूल और स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों का ठीक से पालन नहीं कर रहे हैं। कहीं न कहीं नैतिकता की किताब को बंद करके किसी कौने में रख दिया गया है। खबर में एक नवीं कक्षा की छात्रा का जिक्र था जो अपने घर से 38 लाख रुपये चुराकर अपने दोस्तों के साथ उत्तराखंड घूमने गई थी। लड़की के इस कृत्य से जहां पुलिस ने शक के दायरे में पड़ोसियों को ले लिया वहीं लड़की के साथ गई तीन लड़कियों के गायब होने से भी क्षेत्र में सनसनी फैल गई। जाहिर है जो कुछ भी हुआ उसकी उम्मीद कोई भी माता-पिता और सभ्रांत समाज अपने बच्चों से नहीं करेगा। लड़की ने जो कदम उठाया वह उसकी नादानी भी हो सकती है और किसी का उकसावा भी। लेकिन सवाल यह है कि इस तरह की नादानी करने का या किसी के उकसावे में आने का मौका आप और हम ही अपने बच्चों को दे रहे हैं। जिंदगी और कमाई की भागदौड़ में हमारा बच्चों से संवाद पूरी तरह कट चुका है। हम अपने पूरे दिन व्यस्तताओं में इतने लीन हो चुके हैं कि न हम अपने बच्चों से उनके दिन की जानकारी लेते हैं और न ही यह सवाल करते हैं कि उन्हें किसी बात की परेशानी है या नहीं। अपनी टेंशन और सिरदर्दी दूर करने के लिए हमने बच्चों के हाथों में महंगे फोन और लेपटॉप थमा दिए हैं और इसे ही हमने अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लिया है। बच्चें इन साधनों का कैसा इस्तेमाल कर रहे हैं, कैसा व्यक्ति इन साधनों के माध्यम से इनके सम्पर्क में आ गया है इसके बारे में हमारे पास जानने तक का समय नहीं है। किशोर और बाल अवस्था की उम्र में सही और गलत बातें बड़ी तेजी से स्थान बनाती हैं। गलत बातों को बच्चों से दूर रखना अपने आप में बड़ी चुनौती है, लेकिन इसका मुकाबला अभिभावक बच्चों से निरंतर संवाद करके कर सकते हैं। नहीं तो हमें ऐसे भटकाव आने वाले समय में और भी देखने को मिलेंगे जो कि समाज के लिए काफी घातक हो सकता है।

धन्यवाद! मनोज कुमार