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ग़ाजियाबाद

जुबान संभाल के (25/02/2021)

किस नारंगी पार्षद ने ले लिये एक लाख रूपयें

किस्सा भगवा गढ़ में एक लाख रूपये एडवांस और 50 हजार रूपये के तकाजे का गूंज रहा हैं। सीन में एक प्रशासनिक अधिकारी भी हैं और पूरा मामले में पार्षद का आडियो भी बताया जा रहा हैं। रूप भी हैं और पंकज भी हैं और ओरेंजी भी हैं। भगवा मेंबर ने किसी को लाईसेंस दिलाने की बात कही और कहा कि राजस्व वाला ठिया तो हम बनवा देगें पर खर्चा डेढ़ पेटी का आयेगा। देने वाले ने एक पेटी दे दिये और मेंबर ने बाकायदा अफसर के यहां जाकर सिफारिश की। अफसर ने स्टांप वाला लाईसेंस बना दिया और अफसर भी कम चतुर नही थे। स्टांप वाला दो जगह से सिफारिश लगवा रहा था। पहली सिफारिश फ्री वाली थी और दूसरी सिफारिश मेंबर वाली थी। अफसर ने लाईसेंस बनाया और दोनो को ही फोन कर बताया कि आप के व्यक्ति का काम कर दिया हैं। सुरता तो लाईसेंस बनवाने वाला निकला उसने मेंबर से पहले जाकर ओरिजनिल लाईसेंस लपक लिया। सीआरसी बाबू को पता चल गया कि खेल एक पेटी का हुया हैं। कमल वाले गढ़ में अब कमाल ये हो रहा है कि नारंगी पार्षद ने पचास हजार का तकाजा ठोक रखा हैं और रूप कह रहा है कि पहले ओरजिनल लाईसेंस तो दिलवाओ। अब दो आडियो बाहर आने को हैं। कुछ के पास पहुंच गये और कुछ के पास आ जायेगें। अफसर के नाम पर खेल हो गया और अफसर को खबर ही नही।

जब एक मकान पर ले लिया पूरी फैमिली ने लोन

मकान वाले महकमें की जांच हो जाये तो फाईले बोल पड़ेगी कि मालिक घोटाला इधर हैं। साहब लैटर लिखकर दलालो का रोना रोते रहते हैं मगर महकमें में सीटो पर बैठे दलाल उन्हे नही दिखते। मैडम पर जिनकी कृपा हैं एक जांच उन साहब की भी हो। गरीब कालेज मालिक को इसी महकमें ने ढाई लाख का लोन मकान बनाने को दे दिया तो अब वो लोन फैमिली मिली हैं जिसने एक मकान पर अलग अलग पैसे गिन लिये। ये मामला भी लाईन पार का हैं। डूडा जिस पर मेहरबान हुया हैं वो गरीब दस भैंसो का मालिक हैं और दूध की डेरी करता है। पहले पिता के नाम पर लोन फिर मां के नाम पर लोन और फिर खुद के नाम पर भी लोन ले लिया। ये लोन कृपा डूडा से ही बरसी हैं और कृपा के बदले दलाल ने पार्टी को पूरा हलाल किया हैं। इस मामलें की भी शिकायत नामित पार्षद ने ही की हैं मगर एक्शन लापता हैं।

महकमें के मंत्री से पूछेगें या वेतनभोगी सतंरी से

विधानसभा का ये इलाका कुछ ज्यादा ही पढ़ा लिखा हैं और इधर के वोटर खुद को इस पार का ना मानकर किसी और पार का मानते हैं। इलेक्शन मैनीफेस्टो उन्हे रटा पड़ा हैं और मौके पर वो इसे ईमेल से लेकर व्हाटासअप भी करते हैं। अब उनका गिला ये हैं कि फोन पर तो मंत्री बात करें डायरेक्ट। जब उधर से कहा गया कि फंला से बात कर लो तो इधर से भी बता दिया गया है कि अपनी प्रोब्लम को लेकर हम महकमें के मंत्री से पूछेगें या वेतनभोगी संतरी से। हमने वोट विधायक को दिया है ना कि उसके कर्मचारियों को। वैसे इस अदा से कई खफा हैं अब इस खफा वाले सीन में कई भगवा पार्षद भी हैं और उधर के दो नेता भी हैं। मौहल्ला प्रधानों का कहना है कि चुने हुये जनप्रतिनिधि हम हैं तो हम सुनेंगें समस्याये या तनखईया भी सिफारिश के फोन करेगा अब ।

ना तो इस पार से ना उस पार से नाम आयेगा सरकार से

भगवा लेडी मोर्चे की सिटी वालीकुर्सी को लेकर मोर्चाबंदी लोकल वाली पूरी वोकल होकर कर रही हैं। कोई गारंटी ले रही है कि चाचा जी से कहकर पद तो दिलवाऊंगी मेयरली कोर में तुम्हारा ही नाम आयेगा तो किसी को जनरली इतना भरोसा है कि डेफिनेटिली हम ही बनेगें। अब कहने वाले ने कहा कि हिस्ट्री देख लो मिस्ट्री अपने आप समझ में आ जायेगी। कमांडरी हाथ नही अगर चार घर सेट ना होते। मेयरली तो निगम वाला नाम भी कोर से नही लखनऊ से फाईनल हुया। फिर बता दिया कि ना तो इस पार से ना उस पार से इस बार नाम ही सरकार से आयेगा और हाईकमान की मुहरसे

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