नाम बड़े ओर दर्शन छोटे

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गाजियाबाद। हमारे सांसद व केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री पूर्व जनरल वीके सिंह ने हाल में भाजपा सरकार ओर अपनी एक साल की उपलब्धियों का बखान खूब बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। (opinion newspaper articles) उन्होंने मेट्रो को गाजियाबाद में लाने का श्रेय भी ले लिया, एनएच-24 ओर 58 के चौड़ीकरण की उपलब्धि भी अपने खाते में जोड़ ली। लेकिन जो गांव मीरपुर हिंद जनरल साहब ने गोद लिया था, उसमेें विकास कार्य क्यों नहीं हुआ, इस पर वह जबाव नहीं दे पाये। बस ढीकरा यह कहकर गांव प्रधान के सिर फोड़ दिया कि वह सहयोग नहीं करता है। अब भला यह बात किसको हजम होगी कि किसी के गांव में विकास हो ओर वहां का प्रधान विकास का अवरोधक बन जाए। जो भी है नाम बड़े होने के बावजूद एक ऐसे गांव का विकास न करा पाना, जिसे विशेष रूप से गोद लिया गया हो, सांसद की वर्किंग पर सवालिया निशान खड़े करता है। अगर सांसद अपने क्षेत्र में पर्याप्त समय दे रहे होते, निरंतर गांव का दौरा कर रहे होते तो यह स्थिति सामने नहीं आती। गांव तो महज कागजों पर गोद लिया गया है, ओर कागजी तौर पर ही उसकी देखभाल हुई, जिसके नतीजें आज सबके सामने हैं। भाजपा की संगठन ही इस वक्त वीके सिंह के साथ खड़ा नजर नहीं आ रहा है। मीरपुर हिंद गांव लोनी क्षेत्र में पड़ता है, और यहां से जिलाध्यक्ष नंदकिशोर गुर्जर का जुड़ाव भी है, लगाव भी है, और कहीं न कहीं विधानसभा चुनाव लड़ने की हसरत भी है। इस सबके बावजूद अगर एक गोद लिये गये गांव का विकास नहीं होता है, तो यह संगठन की वर्किंग पर बड़ा सवाल है। जनरल साहब ने एक प्रेसवार्ता में यह बताया कि उन्होंने एक वर्ष के कार्यकाल में प्रति सप्ताह एक दिन का समय अपने संसदीय क्षेत्र में दिया है। लगभग पूरे वर्ष में वह 58 दिन गाजियाबाद आये, अपनी पैचीदगियों का हवाला देते हुए सांसद ने कहा कि वह तीन मंत्रालय देख रहे हैं, ओर इस लिहाज से पर्याप्त समय उन्होंने गाजियाबाद को दिया है। यहां पर भी सवाल यही उठता है कि जनरल का स्पष्टीकरण ठीक हो, वह मंत्री हैं, इसलिए अपने क्षेत्र को समय न दे पा रहे हो, लेकिन भाजपा के लोग उनके इस मैसेज को पूरे वर्ष जनता तक क्यों नहीं पहुंचा पाए , इसकी समीक्षा सांसद को करनी होगी। साथ ही उन्हें एक अपना ऐसा प्रतिनिधि क्षेत्र को देना होगा, जो क्षेत्र की जनता के लिए रात दिन उपलब्ध रहे। फिलहाल जो लोग जनरल के अभाव में उनकी व्यवस्थाओं को गाजियाबाद में देख रहे हैं, उनसे खुद स्थानीय नेता ही संतुष्ट नहीं हैं। वह कितने अच्छे काम गाजियाबाद के लिए क्यों न करें, उनकी अनुपस्थिति ही अंत तक बड़ा मुद्दा बनी रहेगी, और इसे जिंदा रखने का काम खुद यहां के नेता ही करेंगे। हमारे सांसद का नाम बेशक बहुत बड़ा है, लेकिन उनके दर्शन तब तक छोटे रहेंगे, जब तक वह अपना कोई स्थायी प्रतिनिधि जनता के बीच में नहीं देते हैं।