मीडिया के सिर टीआरपी का जुनून

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वर्ष-1993 मुम्बई बम धमाकों के आरोपी याकूब मेमन को 30 जुलाई को फांसी पर लटका दिया गया। (ghaziabad hindi news) बड़े बड़े चैनल वालों ने, खबर नफीसों ने इस पूरे प्रकरण का ऐसे कवरेज किया, जैसे देश को कोई बहुत बड़ी क्षति हो गई हो। न्यायालय के आदेशों पर राजनैतिक पार्टी के प्रमुख नेताओं ने उंगलियां उठा दी। किस किसने याकूब के लिए दया याचिका राष्ट्रपति के यहां लगाई उनके नामों को लेकर लंबी बहस होती नजर आई। फांसी की रात तक मीडिया वाले जागे और यह जानने की कौशिश करते रहे कि याकूब मेमन अपनी सजा के अंतिम दिन कितने बजे उठा, किस किससे उसने बात की, उसने आखिरी इच्छा क्या प्रकट करी, क्या खाया, क्या किया। इन सभी बातों को इलेक्ट्रानिक मीडिया ने पूरी भव्यता से पेश किया। याकूब के जीवन का एक एक पहलू मीडिया वाले परोसते चले गये। एक शख्स जिस पर ढाई सौ से अधिक लोगों की हत्या करने का आरोप था उसकी प्रस्तुति जिस ढंग से की गई, उसे देखकर लगा कि मीडिया वालों की टीआरपी की भूख ने आंतक के संदेश को खण्डित करके रख दिया। सोशल साइट पर कहीं याकूब के समर्थन में आवाजें उठने लगी तो कहीं सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को एक बहुत बड़े वर्ग ने एतिहासिक व आंतक को मुंह तोड़ देने वाला बताया। सवाल याकूब की फांसी का नहीं, सवाल है उस गुनाह का जो याकूब ने किया। गुनाह करने वाले का कोई धर्म नहीं होता। वह हिन्दु हो या मुसलमान या फिर किसी भी धर्म का व्यक्ति हो अगर वह देश द्रोह कर रहा है तो वह केवल गुनाहगार है, लेकिन याकूब मेमन के पूरे मामले को अधिकतर मीडिया चेनलों ने टीआरपी बढ़ाने का मुद्दा बना लिया। आंतकवाद जैसे मुद्दे बेहद संवेदनशील होते हैं, ऐसे मामलों में कोई भी गुनाहगार हो उसे ज्यादा प्रचार नहंी दिया जाना चाहिए। ऐसे अगर हम करते हैं तो हम जनता को गुमराह करने का काम कर रहे हैं। मीडिया को अपनी जिम्मेदारी को समझना चाहिए, कोर्ट के आदेशों पर अगर लोगों को बैठाकर डिबेट कराई जायेगी, तो इससे जनता का न्याय पालिका से विश्वास उठेगा, ऐसे में हमें अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, क्योंकि मुद्दा याकूब नहीं मुद्दा आंतकवाद है। जिससे इस वक्त पूरा देश जूझ रहा है और किसी चैनल की टीआरपी देश की सुरक्षा से बड़ी नहीं हो सकती। -धन्यवाद! मनोज गुप्ता