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जाति और धर्म के सैलाब में बह गयी विकास की पुलिया

वरिष्ठ संवाददाता (करंट क्राइम)
गाजियाबाद। देश की सियासत का भाग्य विधाता कोई नेता नहीं होता है। यहां सियासत का भाग्य विधाता मतदाता होता है। मंचों से हर दल विकास की बात करता है। विकास के मुद्दे पर ना टिकट मिलता है और ना ही वोट मिलता है। जब टिकट ही जाति के समीकरण को आधार में रखकर दिया जाता है तो फिर ये विकास वाली बातें मंचों से होती क्यों हैं। इसके लिए आम मतदाता भी उतना ही जिम्मेदार है जितना राजनीतिक दल। 11 फरवरी को जब मतदान शुरू हुआ तो विकास की पुलिया जाति और धर्म के सैलाब में बह गयी। विकास का मुद्दा धरा रह गया और जातिगत फैक्टर में पूरा चुनाव बह गया। कहीं धर्म का कार्ड था तो कहीं जाति के आधार पर मतदाता ईवीएम का बटन दबाकर आ गए। मुरादनगर में बात तो सरकार बदलने की हो रही थी लेकिन जब सरकार बदलने का मौका मिला तो मतदाता अपनी जाति का मोह भी नहीं बदल सके। यहां जाट मतदाता नीति पर नहीं बल्कि जाति के हिसाब से ईवीएम पर आकर बट गए। इसी सीट पर त्यागी वोटर भी जाति वाले सैलाब में बह गया। यहां भाजपा को भी एक वर्ग का नुकसान हुआ। परंपरागत रूप से भाजपा के वोटर माने जाने वाले वैश्य वर्ग ने इसलिए हाथ का बटन दबा दिया क्योंकि उनकी जाति का उम्मीदवार चुनाव मैदान में था। लोनी में बदहाली का मुद्दा कोने में बैठ गया और हिंदू और मुस्लिम होना विकास से बड़ा था। यहां लोग पहले धर्मों में बंटे और फिर जातियों में बट गए। साहिबाबाद में कहने को एक बड़ी आबादी उच्च शिक्षित है पर यहां भी जाति और धर्म दोनों ही मुख्य रहे। ब्राहमण वोटर यहां विकास पर नहीं बल्कि अमरपाल शर्मा और सुनील शर्मा के बीच बेहतर ब्राहमण के खेमों में बंट गया।
बसपा ने यहां से मुस्लिम उम्मीदवार उतारा था। इसलिए पार्टी से बड़ा धर्म था। जिन्होंने 2012 में बसपा के अमरपाल शर्मा को वोट दिया था वो इस बार हाथी से दूर रहे क्योंकि उनकी निगाह में बसपा से बड़ा उनका धर्म था। विकास का मुद्दा यहां भी धराशाही हो गया। शहर सीट पर तो और भी अधिक कमाल हुआ। यहां शुरू से मुकाबला भाजपा और बसपा के बीच माना जा रहा था। लाईन पार क्षेत्र की बदहाली का मुद्दा कई सालों से चुनावी मुद्दा है। जब इस मुद्दे पर फैसला सुनाने का समय आया तो वो ब्राहमण जो विजयनगर में रहते हैं और जिनके कहने पर विधायक रहे सुरेश बंसल ने विकास कार्य कराए वो भी ईवीएम पर अपनी जाति को खोजते नजर आए। यहां ब्राहमणों में विकास नहीं बल्कि जाति का मुद्दा हावी हो गया। मोदीनगर में भी जब चुनाव का मौका आया तो पार्टी नहीं बल्कि धर्म सबसे पहले प्राथमिकता पर आ गया। यहां मतदाता ईवीएम पर हिंदु और मुस्लिम में बंट गया। सारी समस्याएं भूल कर लोग केवल मजहब वाले खानों में खड़े नजर आए। धौलाना में भी यही हाल हुआ। यहां सड़क, नाली, खडंजे व अन्य विकास की बातें धुंए की तरह हवा में उड़ गयीं। यहां भी चुनाव हिंदु मुस्लिम के बीच आ गया। बातें विकास की हो रही थीं, बातें सरकार बदलने की हो रही थीं। और जब फैसला सुनाने का समय आया तो उंगलियों ने ईवीएम का बटन ही जाति और मजहब देखकर दबाया। लोकतंत्र में इस स्थिति के लिए नेता से ज्यादा मतदाता जिम्मेदार है। नेताओं ने वो हालत पैदा कर दी कि जाति और धर्म सबसे अहम हो गया और मतदाताओं ने भी बताया कि उनके लिए विकास और रोटी से पहले जाति और धर्म है।

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