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ग़ाजियाबाद

बात लूलुओं की (रवि के तरकश के तीर 25/05/2020)

सुबह से कई लोगों को फोन कर चुका हूँ मगर संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। बाबा गूगल भी तसल्लीबक्श जवाब नहीं दे पा रहा। दरअसल मैं ह्य लूलू ह्य शब्द का कोई शालीन सा पर्यायवाची शब्द ढूँढ रहा हूँ मगर मिल ही नहीं रहा। कोई कहता है इसके बदले निरा बेवकूफ शब्द इस्तेमाल किया जा सकता है तो कोई इसका सही शाब्दिक अर्थ बेवकूफ बताता है। अंग्रेजीदाँ लोग क्रेजी जैसे शब्द थमा देते हैं मगर सटीक जवाब कहीं नहीं मिल रहा। अब आप पूछ सकते हैं कि आखिर लूलू शब्द पर मेरा गेयर क्यों अटका हुआ है। जनाब दरअसल मैं ऊँची कुर्सियों पर बैठे लोगों को जो नीतियाँ बनाते हैं , उन्हें लूलू कहे बिना लूलू कहना चाहता हूँ इस लिए कोई बढ़िया सा पर्यायवाची शब्द तलाश रहा हूँ। चलिए आप अपने मन मे कोई भी इसका विकल्प तय कर लीजिये और पूरा ध्यान इन लूलुओं की रीति-नीति पर केंद्रित कीजिये।
शुरूआती लॉकडाउन में जब हालात सामान्य थे तब सख़्ती और अब जब मरीजों का आँकड़ा सवा लाख पार कर गया तब अनेक प्रकार की छूट की बहस पुरानी हो गई है। लाखों लाख मजदूरों के सड़कों पर भूखे प्यासे सैंकड़ों किलोमीटर का सफर पैदल तय करने पर चर्चा भी बासी है। लॉकडाउन की तकलीफों से मरे सैंकड़ों लोगों पर अब बात करने का भी कोई मोल नहीं। अब तो बस हर कोई यह जानना चाह रहा है कि एसे में जब संकट चरम की ओर बढ़ रहा है तब हवाई यात्रा क्यों शुरू की जा रही हैं? जबकि इस सत्य से सरकार भी वाकिफ है कि देश में कोरोना की आमद हवाई यात्रियों के कारण ही हुई। सत्तर फीसदी कोरोना मरीज उन्ही शहरों में हैं जहाँ हवाई अड्डे हैं। चलिए हवाई यात्रा किसी मजबूरीवश आपने खोल भी दी परंतु हवाई जहाज में एक सीट छोड़ कर बैठने का नियम क्यों नहीं बनाया जबकि यातायात के अन्य साधनों पर यह सख़्ती से लागू है। साफ दिख रहा है कि नियम बनाने वाले अमीर को उस निगाह से नहीं देखते जिससे गरीब को देखते हैं।
अमीर-गरीब ही नहीं नीति निर्धारकों ने सरकारी और निजी लाभ को भी अलग अलग चश्मे से देखा है। लॉकडाउन चार में अनेक प्रकार की रियायतें केंद्र सरकार ने पहले ही दिन घोषित कर दीं थीं। प्रदेश सरकार ने भी कुछ बंदिशों के साथ अगले दिन बाजार खुलने की घोषणा कर दी मगर अनेक जिलों में बाजार अभी भी नहीं खुलने दिए गए। मेरे अपने शहर में पाँच दिन लग गये यह फैसला होने में कि बाजार किस व्यवस्था के अनुरूप खुलेंगे। अब जब तय हुआ है तो इस तरह कि लोगबाग चकरघिन्नी बने घूम रहे हैं। हर इलाके के लिए केवल तीन दिन निर्धारित किये गए हैं। सोमवार को फलाँ इलाका तो मंगलवार को फलाँ क्षेत्र। दुकान खुलने का समय भी होगा सुबह दस से शाम पाँच बजे तक। रविवार को सबकुछ बंद। उस दिन सफाई करो और उस दिन बिक्री। अब कोई ऊँची कुर्सियों पर बैठे लोगों से पूछे कि नागरिक जेब में सूची लेकर घूमें कि आज कहाँ का बाजार खुला है और कहाँ का बंद है? चंद दुकानों के सीमित समय के लिए खुलने से वहाँ भीड़ अधिक होगी अथवा कम? कोई यह भी पूछे की इस तरह की बंदिशें शराब की दुकानों के लिए क्यों नहीं हैं? वे तो पिछले बीस दिनो से खुली हैं और सातों दिन शाम सात बजे तक खुलती हैं। क्या उन पर इसलिए कोई बंदिश नहीं लग सकती कि उनसे सरकार को मोटी कमाई होती है और अन्य छोटी-मोटी दुकानें खुलने से मध्य वर्गीय परिवारों का पेट भरता है?
लूलुओं गौर से देखो। आज समाज में सबकी हालत पतली है। तुम्हारी शराब की दुकानों की बिक्री भी चालीस परसेंट रह गई है। देशी दुकानों की तो कई बार बोहनी भी नहीं हो रही और अंग्रेजी शराब की दुकान पर पंद्रह सौ रुपये से महँगी बोतल नहीं बिक रही। मौके की नजाकत समझ समझ कर शराब निमार्ता भी अब महँगी शराब नहीं बना रहे। अपनी कमाई की आपको इतनी चिंता है कि निर्धारित कोटे से कम शराब बेचने वाले दुकानदार पर जुमार्ना लगा रहे हो और उन छोटे दुकानदारों की जरा भी फिक्र नहीं जिन्हें रुपयों की शक्ल देखे हुए कई दिन हो गये? श्रीमान लूलुओं जी जरा एयर कंडीशंड कमरों से बाहर आकर जमीनी हालत भी तो देखो।

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