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स्वर्णों का मिला संजीव को आर्शीवाद

और शुरू हो गई ओबीसी-एससी समाज में बात
वरिष्ठ संवाददाता (करंट क्राइम)

गाजियाबाद। भाजपा में फिलहाल अध्यक्ष पद मानसिंह गोस्वामी को मिला है। एक मौके पर अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी कर रहे संजीव शर्मा को चार पूर्व महानगर अध्यक्षों ने सिर पर हाथ रखकर आर्शीवाद दिया। अब मामला आर्शीवाद का था लेकिन सीन जातिवाद से जाकर जुड़ गया। एक्शन का रिएक्शन भी आना शुरू हो गया है। भाजपा के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य दिनेश गोयल के कॉलेज पर आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में भाजपा के पूर्व महानगर अध्यक्ष चंद्रमोहन शर्मा, विजय मोहन शर्मा, बलदेव राज शर्मा और अशोक मोंगा ने संजीव शर्मा के सिर पर हाथ रखकर आर्शीवाद दिया।
करंट क्राइम में खबर प्रकाशित हुई और फिर आर्शीवाद में जातिवाद का ट्वीस्ट आ गया। चर्चा भाजपा में ही है और कहा यह जा रहा है कि भाजपा के स्वर्ण नेताओं को एक ओबीसी नेता का महानगर अध्यक्ष बनना हजम नहीं हो रहा है। चर्चा भी भाजपा के ओबीसी नेता कर रहे हैं। चर्चा को हवा भी भाजपा के ही नेता दे रहे है और चर्चा भी भाजपा के ही स्वर्ण नेताओं को लेकर हो रही है। अब तक जो साइलेंट बैठे थे, वह बता रहे हैं कि भाजपा का इतिहास ही स्वर्ण जातियों को बढ़ावा देने का रहा है। वह इतिहास के झरोखों से ही बता रहे हैं कि यहां महानगर अध्यक्ष भारत भूषण जैन रहे, विजय मोहन मित्तल रहे, अशोक मोंगा महानगर अध्यक्ष रहे, सुनील शर्मा जिलाध्यक्ष रहे। यहां तक की बालेश्वर त्यागी और डीसी गर्ग भी संगठन की कमान संभाल चुके है। इन नामों को गिनाने का उद्देश्य यही संदेश देना है कि संगठन वाली कुर्सी स्वर्णों के लिए आरक्षित है। यह इतिहास उस सीन के एक्शन का रिएक्शन है, जिसमें संजीव शर्मा को आर्शीवाद दिया गया है। अब एक खेमा कह रहा है कि भाजपा के स्वर्ण नेताओं को एक ओबीसी का अध्यक्ष बनना हजम नहीं हो रहा है। वह नहीं चाहते कि एक ओबीसी दोबारा महानगर अध्यक्ष बन जाए।
अब तर्क भी यह दिया जा रहा है कि जब मानसिंह गोस्वामी महानगर अध्यक्ष बने तो भाजपा के कितने स्वर्ण नेताओं ने उनके सिर पर हाथ रखकर आर्शीवाद दिया। अगर एक ओबीसी महानगर अध्यक्ष बन गया तो उसे आर्शीवाद नहीं देंगे और जो स्वर्ण अभी बना भी नहीं है, उसे आर्शीवाद देने सब आ गए। यहां इस परिधि में चर्चा करने वालों ने वैश्यों को भी लपेट लिया है। वह गिना रहे हैं कि वैश्यों के प्रतिनिधि भी वैश्य ही बनाए गए हैं और सांसद के यहां भी ब्राह्मण और क्षत्रियों को ही प्रतिनिधित्व मिला है। बताते हैं कि चर्चा धीरे-धीरे भाजपा के ही ओबीसी और दलित नेताओं के बीच बढ़ रही है। इस समाज के नेता कह रहे है कि एक बार ओबीसी और दलित को मौका तो देकर देखो। क्या दलित केवल सहभोज के लिए रह गए है। कभी सहयोग भी देकर देख लो। भाजपा जब भी टिकट वाला आर्शीवाद देती है, तो यह आर्शीवाद वैश्यों और ब्राह्मणों को ही क्यों मिलता है। ओबीसी का नंबर ही तब आता है, जब सीट ही ओबीसी हो जाए। कम से कम संगठन में तो ऐसा प्रावधान नहीं है और यहां तो दलित और ओबीसी को मौका दिया ही जा सकता है। यह समाज यह भी चर्चा कर रहा है कि क्या रिकॉर्ड जीत में केवल ब्राह्मण और वैश्यों की भागीदारी रही है। दलित और ओबीसी ने भी तो भाजपा को वोट दिया है। कहने वाले कह रहे हैं कि जिन स्वर्णों ने संजीव के सिर पर हाथ रखा है, वह मानसिंह के सिर पर भी हाथ रखकर आर्शीवाद दे।

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