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मरहूम सिद्घेश्वर पांडे के बेटे बोले, अपराधी बनाने में समाज भी दोषी

कानपुर | कानपुर के बिकरू गांव में आठ पुलिस कर्मियों की बर्बर हत्या के मुख्य आरोपी विकास दुबे का आतंकी साम्राज्य अब समाप्त हो चुका है। दस जुलाई को वह एनकांउटर में मारा गया। करीब 20 साल पहले विकास दुबे ने अपने गुरु और ताराचंद इंटर कॉलेज शिवली के प्रधानाचार्य सिद्घेश्वर पांडेय की हत्या की थी। यह हत्या उसने कॉलेज की जमीन कब्जाने की मंशा से किया था।

अब दुर्दात विकास के खात्मे से सिद्घेश्वर पांडेय के परिजन काफी संतुष्ट हैं। उनके बेटे राजेन्द्र पांडेय ने कहा कि 20 साल बाद आत्मशांति मिली है। हालांकि हम लोग न्याय की उम्मीद छोड़ चुके थे लेकिन ईश्वर की कृपा से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हमें न्याय दिलवाया है। अब हम लोगों को संतुष्टि मिली है।

राजेन्द्र पांडेय अपराधी बनाने में समाज को भी दोषी मानते हैं। उनका कहना है कि समाज में तमाम ऐसे लोग हैं, जो अपराधियों का साथ देते हैं। इससे उनका मनोबल बढ़ता है। नेता भी अपना वोट बैंक साधने के लिए इन्हें तवज्जो देते हैं। इससे अपराधियों के पास अकूत पैसा आने लगता है। फिर उसके दम पर पुलिस से गठजोड़ होता है। पांडेय ने कहा कि अगर समाज के लोग और नेता इनका साथ न दें, तो अपराध अपने आप रूक जाएगा।

बीस साल पुरानी घटना के बारे में जिक्र करते हुए राजेन्द्र पांडेय ने बताया कि हमारे पिता सिद्घेश्वर पांडेय कानपुर के शिवली में रोड के किनारे एक जगह डिग्री कालेज बनाना चाहते थे। लेकिन विकास इस जमीन पर अवैध कब्जा करना चाहता था। इसी मंशा से एक बार उसने वहां ताला भी डाल दिया था। इस बीच पिता जी वहां कालेज निर्माण का कार्य करवा रहे थे। तभी विकास दुबे अपने गुर्गो के साथ आया और पिताजी की दिन दहाड़े हत्या कर दी। यह घटना नवम्बर 2000 की है।

उन्होंने बताया कि इस मामले में विकास को उम्र कैद हुई, लेकिन जमानत पर वह बाहर आ गया। इस केस में उसके बहनोई दिनेश तिवारी और भाई दीपू को भी सजा हुई थी। पांडेय ने बताया कि इस केस में उनकी तरफ से तीन गवाह थे। लेकिन विकास के खौफ से वे मुकर गये। उन लोगों ने गवाही नहीं दी। नतीजा यह हुआ कि वह बच गया। हालांकि मामला अभी भी हाईकोर्ट में विचाराधीन है। उन्होंने बताया कि इस मामले में मुझे भी कई बार विकास ने धमकी दी और आर्थिक लालच भी दिया कि इस केस को भूल जाओ, लेकिन पिता से बढ़कर पैसा तो नहीं है। जीवन ईश्वर के हाथ में है।

राजेन्द्र पांडेय ने बताया, “विकास के बाद अभी भी उसके पांच-छह साथी हैं जो अपराधी हैं। उनकी गिरफ्तारी होनी चाहिए। अभी मैं केस लडूंगा। मुझे इनके परिवार से किसी प्रकार का कोई द्वेष नहीं है। विकास के भाई बहन और कई रिश्तेदारों को मेरे पिता ने पढ़ाया है। सभी इसी कालेज में पढ़े हैं। लेकिन ये लोग धोखेबाज रहे हैं। हम लोग हाईकोर्ट में केस खुलने का इंतजार करते रहे। खैर अब जाकर हमें कुछ न्याय मिला है। एक सवाल के जवाब में कहा कि अब उस जमीन पर पिताजी की मंशा पूरी करने के लिए डिग्री कलेज खोलने का विचार करेंगे।”

उन्होंने बताया, “हमारे पिताजी वर्ष 1964 से 1998 तक ताराचन्द्र पांडेय इण्टर कालेज के प्राधानाचार्य रहे। इसके बाद वह कॉलेज प्रबंध समिति के सहायक प्रबंधक हो गये थे। इस दौरान शिवली टॉउन में वह संकटा प्रसाद पांडेय के नाम से डिग्री कालेज बनाना चाहते थे। तभी उनकी हत्या कर दी गई थी।”

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