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ग़ाजियाबाद दिल्ली एन.सी.आर

उठते सवालों का करंट

किसी ने सही कहा है कि ऊपर वाला कर्म देखता है वसीयत नहीं। कोरोना वायरस के संक्रमण के बीच इस दौर में सबसे ज्यादा परेशानी उस गरीब तबके पर आई है जो दो वक्त की रोटी कमाने के लिए सुबह घर से निकलकर शाम को घर में दिहाड़ी के पैसे लेकर पहुंचता था। आज सभी तरह के कार्य बंद हैं। यह गरीब अब सरकार और समाजसेवियों के भरोसे हैं। सरकार अपनी ओर से राशन उपलब्ध करा रही है। समाजसेवी भी अपनी हैसियत के अनुसार सेवा भाव में पीछे नहीं हैं। मकसद सिर्फ एक है कि कोई परिवार भूखा न सोये। यह वक्त आया है चला भी जाएगा। मगर चर्चाएं उन्हीं की होंगी जो इन विपरीत परिस्थितियों में पैसे बचाने में नहीं बल्कि उन्हें गरीबों के लिए खर्च करने को लेकर सामने आये हैं। यूं तो गाजियाबाद में इस आपदा में कई समाजसेवियोें और संस्थाओं ने निरंतर गरीबोें को खाना उपलब्ध कराकर मिसाल पेश की है। मगर इन सबके बीच में एक चेहरा ऐसा भी है जो कोई संस्था नहीं चलाता। जिसके मन में राजनीति में कुछ बड़ा पाने की इच्छा भी नहीं है। बस वह यह चाहता है कि इस कठिन दौर में कोई गरीब भूखा न सोये। हम बात कर रहे हैं यहां पर भाजपा नेता एवं समाजसेवी अजय गुप्ता की। यह शख्स लॉक डाउन लगने के बाद से अब तक अपने निजी एवं संबंधों के बूते गरीबों को खाना उपलब्ध करा रहे हैं। अजय गुप्ता में सेवा का करंट ऐसा है कि वह अपनी इस मुहिम में अपने परिवार को साथ लेकर चलते हैं। जनसेवा का भाव उनके बच्चों को साथ साथ उनके दामादों और बेटियों में भी नजर आता है। पूरा परिवार विपदा की इस घड़ी में आज भी जनसेवा करता हुआ देखा जा सकता है। मार्च में लॉक डाउन घोषित होने ने बाद जब काफी संख्या में प्रवासी मजदूरों ने अपने घरों की राह पकड़ ली थी तब अजय गुप्ता अपने परिवार के साथ इन सबको खाने के पैकेट के साथ-साथ मास्क, सेनेटाइजर देते हुए सड़कों पर नजर आये थे। सेवा का यह जज्बा पहले दिन से शुरु होकर अब तक जारी है। कोरोना योद्धाओं का सम्मान करने में भी अजय गुप्ता कभी पीछे नहीं रहे। समाजसेवा के उनके इस समर्पण को देखकर कई सामाजिस संस्थाओं ने उन्हें प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित भी किया है। सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर अजय गुप्ता उस दौर में जब बड़े बड़े व्यापारी भविष्य की चिंता से ग्रस्त होकर अपनी तिजौरियों को बैकअप देने के लिए ताले लगा रहे हैं। तो फिर अजय गुप्ता ऐसा क्यों नहीं कर रहे। वजह स्पष्ट है कि जहां मानवता का भाव होता है वहां चाहकर भी व्यक्ति ऐसा कर नहीं पाता है। अजय गुप्ता और उन जैसे समाजसेवी हकीकत में कोरोना वॉर्रियर कहे जाने चाहिए। वह आज सड़कों पर हैं तो कई घरों में राशन पहुंच रहा है, चूल्हा जल रहा है। मेरे पास एक दिन अजय गुप्ता का फोन आया और उन्होंने कहा कि अगर आपको कहीं किसी गरीब को खाद्य सामग्री भिजवानी हो तो मुझे बता देना। मैं अवश्य भिजवाऊंगा। यह वक्त ज्यादा से ज्यादा गरीबों की मदद करने का है। शाम को श्री गुप्ता को मैंने फोन किया। मैंने बताया कि मैं आपके पास एक व्यक्ति को भेज रहा हूं। उसके परिवार में 10 लोग हैं। उन्हें राशन की आवश्यकता है। जरूरत मंद व्यक्ति को मैंने श्री गुप्ता का नम्बर दिया। थोड़ी देर बाद उस व्यक्ति का मेरे पास पलट कर फोन आया। उसने कहा कि समाज में आज भी ऐसे लोग हैं हमें यकीन नहीं होता। जिन भाई साहब के पास आपने भेजा था उन्होंने लगभग 20 दिन का राशन हमें उपलब्ध करा दिया है। मेरा परिवार भगवान से हमेशा उनके लिए दुआ करेगा। इस कठिन दौर में जहां रोजगार पूरी तरह बंद हैं। वहां किसी व्यक्ति की जरूरत पूरी हो जाना कोई छोटी बात नहीं है। बड़ी बात यह है कि इन बातों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए अजय गुप्ता जैसे लोग समाज में मौजूद हैं। अपनी कार्यशैली से वह समाज से लेकर मीडिया तक की नजरों में हैं। भविष्य में जब भी कभी आपदा के इस दौर का जिक्र आयेगा। तब मदद करने वालों में अजय गुप्ता का नाम भी लिया जाएगा। मदद की मात्रा क्या है यह जरूरी नहीं है। मदद का जज्बा क्या है वह महत्व रखता है। समाज में आज अजय गुप्ता जैसे लोगों की वजह से गरीबों को भोजन पहुंच रहा है। इस समाजसेवा के पीछे छुपा कोई लालच नहीं है जो एक मिसाल है। ऐसे समाजसेवियों को भी कोरोना वॉर्रियर्स बुलाया जाये तो कोई हर्ज नहीं होगा।

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