झुग्गियों वाले भी हैं देश के नागरिक

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शनिवार तड़के तीन बजे एक भयानक हादसा हुआ। औरतें जहां चिल्ला रहीं थी। वहीं बच्चों के रोने की आवाज से माहौल की हहीकत बयां हो रही थी। हर तरफ एक ही आवाज थी, बचाओ…बचाओ…बचाओ…! यह भयावह नजारा जिला गाजियाबाद के थाना लिंक रोड आलीशान होटल रेडिसन के पीछे उन झुग्गियों का था जहां अचानक लगी आग ने बड़ा रूप ले लिया था। (ghaziabad current crime opinion) अचानक हुई आग जनी से भले ही जान को नुकसान नहीं हुआ, लेकिन एक गरीब की पूंजी जो उसने कर्म की मेहनत से सींचकर तैयार की थी, स्वाह हो गई। भला कौन झुग्गियों में रहना चाहता है। हर व्यक्ति का यही प्रयास होता है कि वह बड़ा आदमी बनें, लेकिन विधि ने सबके लिए विधान एकसा नहीं लिखा है। ऐसे में मानवता ही ऐसा धर्म बचता है जो मुश्किल वक्त में मदद के रूप में सामने आता है। जो 200 झुग्गियां आगजनी के इस हादसे में खाक हुईं हैं उसमें रहने वाले गरीब अब सड़क पर आ गए हैं। टीन-टप्पर की जिस छत से धूप और बारिश से ये लोग बचा करते थे वह भी अब इनके सिर पर नहीं रही। अधिकारियों का तर्क है कि हादसे से पीढ़ित लोगों का पर्नवास नहीं किया जा सकता। क्योंकि वह जिस जमीन पर रह रहे थे वह सरकारी है। अगर उनकी खुद की जमीन होती तो शायद सरकार से आर्थिक मदद मिल जाती। अधिकारियों का यह तर्क बड़ा अजीब लगता है। एक तो वह व्यक्ति जिसके पास खुद का मकान नहीं उसे कोई आर्थिक मदद नहीं और अगर मकान होताौ तो आर्थिक मदद मिल जाती। क्या झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग देश के नागरिक नहीं हैं। क्या सरकार का यह दायित्व नहीं बनता कि वह तमाम योजनाओं के साथ गरीबों पुर्नवास की भी योजना चलाये। हालांकि कई योजनाएं चलाईं भी जा रही हैं, लेकिन इसमें प्रशासनिक स्तर पर बंदर-बाट की बहुत ज्यादा बू है। जिन गरीबों का आशियाना आग लगने से छिना है वह भले ही उनका न हो, लेकिन था तो सही। मेरा मानना है कि जब इस हादसे से यह साबित हो गया है कि यह लोग सरकारी जमीन पर रह रहे थे तो फिर क्यों न इनके नामों को सूचिबद्ध कर इनके पुर्नवास के प्रयास किये जाएं। क्यों न इन्हें डूडा, कांशीराम आवास योजना का लाभ देकर फिर से बसाया जाये। गरीब का दर्द यदि समय न नहीं समझा तो इसके भयानक परिणाम भी भविष्य में देखने को मिल सकते हैं। अधिकारी पूरे इस प्रकरण को गम्भीरता से लें और इनके पुर्नवास का प्रस्ताव तैयार कर सरकार को भिजवाए, ताकि एक अच्छी व्यवस्था की नींव का भागीदार गाजियाबाद बने। धन्यवाद-मनोज कुमार