रवीश कुमार ने अपने भाषण में भारत के मौजूदा राजनीतिक हालातों पर तल्ख टिप्पणी की

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नई दिल्ली (ईएमएस)। फिलीपीन्स की राजधानी मनीला में एनडीटीवी इंडिया के रवीश कुमार को रेमॉन मैगसेसे सम्मान प्रदान किया गया। इस प्रतिष्ठित सम्मान को पाने वाले रवीश ने अपने भाषण में भारत की दक्षिणपंथी राजनीति को कटघरे में खड़ा किया।
उन्होंने कहा ‘हर जंग जीतने के लिए नहीं लड़ी जाती, कुछ जंग सिर्फ इसलिए लड़ी जाती हैं, ताकि दुनिया को बताया जा सके, कोई है, जो लड़ रहा है।’ रवीश कुमार ने कहा ‘दुनिया असमानता को हेल्थ और इकोनॉमिक आधार पर मापती है, मगर वक्त आ गया है कि हम ज्ञान असमानता को भी मापें। आज जब अच्छी शिक्षा खास शहरों तक सिमटकर रह गई है, हम सोच भी नहीं सकते कि कस्बों और गांवों में ज्ञान असमानता के क्या ख़तरनाक नतीजे हो रहे हैं। ज़ाहिर है, उनके लिए व्हॉट्सऐप यूनिवर्सिटी का प्रोपेगंडा ही ज्ञान का स्रोत है। युवाओं को बेहतर शिक्षा नहीं पाने दी गई है, इसलिए हम उन्हें पूरी तरह दोष नहीं दे सकते। ‘
उन्होंने कहा कि इस संदर्भ में मीडिया के संकट को समझना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, अगर मीडिया भी व्हॉट्सऐप यूनिवर्सिटी का काम करने लगे, तब समाज पर कितना बुरा असर पड़ेगा।
रवीश ने कहा ‘अच्छी बात है कि भारत के लोग समझने लगे हैं। तभी मुझे आ रही बधाइयों में बधाई के अलावा मीडिया के ‘उद्दंड’ हो जाने पर भी चिंताएं भरी हुई हैं। इसलिए मैं खुद के लिए तो बहुत ख़ुश हूं, लेकिन जिस पेशे की दुनिया से आता हूं, उसकी हालत उदास भी करती है।
क्या हम समाचार रिपोर्टिंग की पवित्रता को बहाल कर सकते हैं। मुझे भरोसा है कि दर्शक रिपोर्टिंग में सच्चाई, अलग-अलग प्लेटफॉर्मों और आवाज़ों की भिन्नता को महत्व देंगे। लोकतंत्र तभी तक फल-फूल सकता है, जब तक ख़बरों में सच्चाई हो। मैं रैमॉन मैगसेसे पुरस्कार स्वीकार करता हूं। इसलिए कि यह पुरस्कार मुझे नहीं, हिन्दी के तमाम पाठकों और दर्शकों को मिल रहा है, जिनके इलाक़े में ज्ञान असमानता ज्यादा गहरी है, इसके बाद भी उनके भीतर अच्छी सूचना और शिक्षा की भूख काफी गहरी है।’
पत्रकारिता के प्रति अपने सरोकारों को जाहिर करते हुए रवीश ने कहा ‘बहुत से युवा पत्रकार इसे गंभीरता से देख रहे हैं। वे पत्रकारिता के उस मतलब को बदल देंगे, जो आज हो गया है। मुमकिन है, वे लड़ाई हार जाएं, लेकिन लड़ने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं है। हमेशा जीतने के लिए ही नहीं, यह बताने के लिए भी लड़ा जाता है कि कोई था, जो मैदान में उतरा था।’
उन्होंने कहा ‘भारत का मीडिया संकट में है और यह संकट ढांचागत है, अचानक नहीं हुआ है, रैन्डम भी नहीं है। पत्रकार होना अब व्यक्तिगत प्रयास हो गया है, क्योंकि समाचार संगठन और उनके कॉरपोरेट एक्ज़ीक्यूटिव अब ऐसे पत्रकारों को नौकरियां छोड़ देने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जो समझौता नहीं करते। फिर भी यह देखना हौसला देता है कि ऐसे और भी हैं, जो जान और नौकरी की परवाह किए बिना पत्रकारिता कर रहे हैं।
फ्रीलांस पत्रकारिता से ही जीवनयापन कर रही कई महिला पत्रकार अपनी आवाज़ उठा रही हैं।’
रवीश के अनुसार ‘जब कश्मीर में इंटरनेट शटडाउन किया गया, पूरा मीडिया सरकार के साथ चला गया, लेकिन कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने सच दिखाने की हिम्मत की, और ट्रोलों की फौज का सामना किया। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि संगठनों और उनके नेताओं से कब सवाल किए जाएंगे?’