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रफाल, अम्बानी और बीरा मिस्त्री (रवि के तरकश के तीर (01-08-2020)

1992 में पहली बार कार खरीदी- मारुति 800। दोस्तों ने खूब समझाया कि मारुति के अधिकृत सर्विस स्टेशन से ही कार की सर्विस और मरम्मत कराना मगर पता नहीं क्यों मुझे अपने पड़ौस के एक मिस्त्री बीरा पर बहुत भरोसा था। कुछ महीने पहले ही मेरे कार्यालय के निकट उसने अपनी दुकान खोली थी। कार मरम्मत का उसे कितना तजुर्बा है यह तो मैं नहीं जानता था मगर मुझे इतना पता था कि मुझे नमस्ते वह बड़े प्यार से करता था। यही नहीं कार खरीदने की मुझे बधाई देने भी वह आया था। नतीजा अपने जीवन की पहली कार की मरम्मत का काम मैंने उसे ही सौंप दिया। कई महीने बाद मेरी समझ में आया कि बीरा अनाड़ी है और कार के बारे में उसे कुछ भी नहीं पता। धीरे धीरे यह बात औरों को भी पता चल गई। नतीजा साल भर बाद बीरा मिस्त्री की दुकान बंद हो गई और मुझे भी अपनी प्यारी कार कौड़ियों के दाम बेचनी पड़ी। खबरों की दुनिया के नए तूफान राफेल जहाज के देश में पहुँचने और एवीएशन की दुनिया के नए बीरा मिस्त्री अनिल अम्बानी का कार्यालय यस बैंक द्वारा अपने कब्जे में लेने के समाचारों के बीच आज मुझे अपना बीरा मिस्त्री बहुत याद आया।
बीरा मिस्त्री से रिलायंस एयरोस्ट्रक्चर लिमिटेड के मालिक अनिल अम्बानी की तुलना हो सकता है कि आपको कुछ अजीब लगे मगर परिस्थितियाँ कुछ कुछ वैसी ही हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में राफेल हवाई जहाज की खरीद में घोटाले के आरोप लगाने वाले राहुल गांधी ने इस खरीद में अनिल अम्बानी की भूमिका पर भी ऊँगली उठाई थी। अनिल की उक्त कम्पनी राफेल की निमार्ता कम्पनी डसॉल्ट एविएशन की आॅफ़्सेट पार्टनर है और राफेल के रखरखाव का तीस हजार करोड़ रुपए का ठेका अनिल अम्बानी की कम्पनी को ही मिला है। चुनाव खत्म होते ही राफेल की खरीद और अनिल अम्बानी की उसमें भूमिका की खबरें भी ठंडे बस्ते में चली गईं मगर अब फिर से गड़े मुर्दे चलने लगे हैं। पाँच राफेल जहान अंबाला में उतरने के बाद भारतीय मीडिया और खास कर न्यूज चैनल्स ने जिस तरह का भौकाल बनाया है साबित किया जा रहा देश में कोई बड़ी क्रांति हुई है उससे और कुछ हो अथवा नहीं मगर पुराने सवाल जरूर सामने आन खड़े हुए हैं। एसा शायद नहीं भी होता मगर इसी बीच यह खबर भी आ गई कि देनदारी न चुकाने पर यस बैंक ने अनिल अम्बानी की तमाम कम्पनियों के मुंबई साँताक्रूज वाला मुख्यालय अपने कब्जे में ले लिया है। यस बैंक का अनिल की कम्पनियों पर दो हजार 892 करोड़ रुपया बकाया है। यही नहीं कम्पनी के साउथ मुंबई स्थित दो फ़्लैट भी बैंक ने अपने अधिपत्य में ले लिए हैं।
हालाँकि यह सवाल पुराना है कि लगभग कंगाल हो चुके अनिल अम्बानी को इतना महत्वपूर्ण ठेका क्यों दिया गया मगर राफेल की जिस तरह से आरतियाँ मीडिया में उतारी जा रही हैं उससे यह सवाल तो खड़ा होता ही है कि यह जहाज यदि इतना महत्वपूर्ण है तो उसके रखरखाव को लेकर लापरवाही क्यों? सबको पता है कि अनिल अम्बानी की तमाम कम्पनियाँ दिवालिया हो चुकी हैं अथवा उनकी हिस्सेदारियाँ बिक चुकी हैं। उनकी कोई भी कम्पनी चल नहीं रही और कभी 45 अरब डॉलर का रहा उनका आर्थिक साम्राज्य अब लगभग डूब चुका है। कुछ माह पूर्व लंदन की एक अदालत में उन्होंने लिखित रूप से स्वीकार किया था कि उनके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है और इस समय उनकी नेट वर्थ शून्य है। अब एसे में यह सवाल तो उठना लाजिÞमी है कि एसे व्यक्ति के जिÞम्मे उस राफेल की देखभाल का काम क्यों लगाया जा रहा है जो किसी भी प्रकार से इसके योग्य नहीं। दुनिया भर में एसे संवेदनशील कामों के ठेके दिवालिया होने की कगार पर खड़ी कम्पनियों को नहीं दिए जाते मगर भारत में फिर भी मोदी सरकार की अनिल अम्बानी पर मेहरबानियाँ कम नहीं हो रहीं। आरोप शारोप तो मैं नहीं लगा रहा। मैं तो बस डर रहा हूँ कि कहीं मेरी तरह मोदी जी भी बीरू मिस्त्री के चक्कर में लुट न जायें।

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