प्रियंका गांधी : इतिहास में परिवार और परिवार का इतिहास

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इन दिनों प्रियंका गांधी को कांग्रेस का महासचिव बनाये जाने से दोनों तरफ के लोगों में भूचाल जैसी हालत देखी जा रही है। इस तरफ उत्साह और उर्जा का बलबला है, तो उधर एक और लोकप्रिय नेता का सामना करने के खतरे से उत्पन्न झुरझुरी। जवाब में सत्ता पक्ष सैद्धांतिक लड़ाईयों में अपनी नाकाबिलियत के चलते व्यक्तिगत और चरित्रगत हमलों के जाने-पहचाने ओछेपन के साथ मैदान में है। उसे कमर के नीचे वार करने में ही महारत हासिल है। सीने पर वार करने का हुनर उसने सीखा ही नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी प्रियंका गांधी के कांग्रेस महासचिव बनाये जाने पर टिप्पणी करने से अपने को रोक नहीं पाये। उनका कहना है कि ‘भाजपा पार्टी को परिवार समझती है और कांग्रेस परिवार को पार्टी।’ जुमला सुनने में कर्णप्रिय लगता है, क्योंकि जुमलों में भाषा की वक्रोक्ति हुआ करती है। पर कर्णप्रिय जुमलों की पूंजी से देश की राजनीति को नहीं चलाया जा सकता और राजनीति के इतिहास को तो कतई नहीं समझा जा सकता।
चलिये आज प्रियंका गांधी के बहाने ‘इतिहास में परिवार और परिवार का इतिहास’ विषय पर थोड़ा विमर्श कर लेते हैं, इससे हमें जुमलेबाजी और देश के प्रति बलिदान करने के तात्पर्यो में अंतर करने का अवसर मिलेगा।
सबसे पहले गंगाधर नेहरु के बारे में जानते हैं। गंगाधर जी, मोतीलाल नेहरु के पिता और जवाहर लाल नेहरु के दादा थे। उनका जन्म १८२७ में हुआ था। जब वे मात्र २८ साल के थे, तब उन्हें दिल्ली के बादशाह और १८५७ की भारतीय-गदर के नेता बहादुर शाह ज़फर ने दिल्ली का कोतवाल नियुक्त किया था। अंग्रेजों ने गदर को कुचलने के लिये बहादुर शाह ज़फर के बेटों को क़त्ल किया और बादशाह को कैद करने के बाद दिल्लीr में कत्लेआम मचाया था। कोतवाल गंगाधर नेहरु के नेतृत्व में हिंदुस्तानी पुलिस ने अंग्रेजों का मुकाबला किया, परंतु बादशाह की गिरफ्तारी के कारण पुलिस में आयी हताशा के चलते उनकी पुलिस ज्यादा वक्त तक टिक नहीं पायी। दिल्लीr अंग्रेजों के कब्जे में चली गयी। गंगाधर जी इतिहास में हिंदुस्तानी हुकूमत के आखिरी कोतवाल हुए। इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत आ गयी। अंग्रेजों ने उनकी गिरफ्तारी के लिये खूब हाथ-पैर मारे, पर सफल न हुए। गंगाधर जी पत्नी जियोरानी देवी और चार बच्चों के साथ आगरा चले गये थे। सन् १८६१ में उनका निधन हो गया। उनके तीन पुत्र थे। सबसे बड़े बंशीधर नेहरू, उनसे छोटे नन्दलाल नेहरू और तीसरे मोतीलाल नेहरू थे। नंदलाल नेहरु बड़े वकील माने जाते थे। मोतीलाल नेहरु ने उनके सहायक के रूप में वकालत शुरु की और आगे चलकर खुद भी एक बड़े वकील बने।
इस तरह नेहरु परिवार का देश प्रेम और अंग्रेजों के साथ शत्रुता का इतिहास १८५७ की क्रांति के दिनों से ही शुरु हो जाता है, जबकि दूसरी तरफ १९४२ में कांग्रेस द्वारा छेड़े गये ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का विरोध और अंग्रेजों का सहयोग करने वालों में प्रमुख रूप से शामिल थे, विनायक दामोदर सावरकर। ये वही सावरकर हैं, जिन्हें नाथूराम गोडसे अपना बौद्धिक गुरु मानता था और भाजपा जिन्हें अपने महापुरुषों में स्थान देती है। सावरकर ने हिंदु महासभा की ओर से अंग्रेजों को अपने समर्थन का पत्र लिखा था और पार्र्षदों, विधायकों तथा नौकरी पेशा वर्ग के लोगों से कहा था, कि वे भारत छोड़ो आंदालन के पक्ष में अपने पदों का त्याग न करें और किसी भी कीमत पर इस आंदोलन का साथ न दें। जबकि कांग्रेस के विधायकों, पार्षदों और जनता के हिमायतियों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था और भारत की स्वाधीनता के आंदोलन में शामिल हो गये थे।
गांधी जी के आव्हान पर कांग्रेस के निर्वाचित प्रतिनिधियों के इस्तीफा दे देने से विधान सभाओं और निगमों में उसका बहुमत समाप्त हो गया था। इसका लाभ उठाते हुए हिंदु महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सिंध, बंगाल और उत्तर-पश्चिमी प्रांत में बड़ी बेशर्मी के साथ अपनी सरकारें बना ली थीं।
अंग्रेजों के दूसरे महाभक्त थे हिंदु महासभा के ही एक और नेता, डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी। वे मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाली बंगाल सरकार में मंत्री थे। उन्होंने गांधी जी के द्वारा स्कूल-कालेज, विधान सभा और अन्य सरकारी जगहों से भारतीयों को इस्तीफा देकर बाहर आ जाने के लिये की गयी अपील के विरोध में वक्तव्य दिया था और भारत छोड़ो आंदोलन का तीव्र विरोध किया था। मुखर्जी ने २६ अगस्त १९४२ को अंग्रेज सरकार को लिखे अपने पत्र में कहा था, ‘‘अब में आपका ध्यान उस समस्या पर केंद्रित करना चाहता हूं, जो कांग्रेस के आंदोलन से निर्मित हो गयी है, जिसके कारण युद्ध के समय व्यवधान और असुरक्षा फैल रही है। ऐसी स्थिति में सरकार को सख्ती के साथ आंदोलन से निपटना चाहिये। जहां तक प्रश्न है कि इस आंदोलन का सामना बंगाल सरकार कैसे करेगी, तो मैं स्पष्ट कर दूं कि हम ऐसा करेंगे कि कांग्रेस के प्रयासों के बावजूद इस राज्य में आंदोलन अपनी जड़ें न जमा सके। अंग्रेज सरकार को कांग्रेस के ऐसे आंदोलन को कुचल डालना चाहिये।’’
आरएसएस के सरसंघचालक एम एस गोलवलकर ने अंग्रेज सरकार को लिखा था कि ‘‘आरएसएस ने अपने को नियम और कानून के तहत रखते हुए १९४२ के आंदोलन से खुद को दूर रखा है।’’ (दोनों पत्रों का स्रोत- विपिन चंद्रा की पुस्तक ‘कम्यूनलिज्म इन मॉडर्न इंडिया’, २००८)

गंगाधर जी के तीसरे पुत्र मोतीलाल नेहरु ने वकालत छोडकर भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में हिस्सेदारी की। जेल यात्राएं कीं। १९२८ में भारतीय संविधान आयोग के अध्यक्ष बनाये गये। मोतीलाल नेहरू का इलाहाबाद में एक आलीशान मकान हुआ करता था ‘आनन्द भवन’। स्वाधीनता संग्राम के समय इसी भवन से कांग्रेस की गतिविधियों का संचालन होता था, इसलिये इसका राष्ट्रीय महत्व हो गया था। इसके ऐतिहासिक महत्व के कारण बाद में इंदिरा गांधी ने अपनी इस एक मात्र संपदा को भी राष्ट्र के नाम समर्पित कर दिया। सहमति पत्र पर उत्तराधिकारियों के तौर पर राजीव गांधी और संजय गांधी ने हस्ताक्षर किये थे।

मोतीलाल नेहरु के पुत्र थे, जवाहरलाल नेहरु। उन्हें ही भारत को आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य के रूप में एक सम्प्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक गणतन्त्र बनाने का वास्तुकार माना जाता है। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो से और कॉलेज की शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज (लंदन) से पूरी की थी। उन्होंने लॉ की डिग्री कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से हासिल की। इंग्लैंड में उन्होंने सात साल व्यतीत किए तथा वहां के फैबियन समाजवाद और आयरिश राष्ट्रवाद के लिए एक तर्कसंगत दृष्टिकोण अपने मानस में विकसित किया।
दिसम्बर १९२९ में, कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में आयोजित किया गया था, जिसमें जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए। इसी सत्र में ’पूर्ण स्वराज्य’ की मांग की गई। २६ जनवरी १९३० को लाहौर में जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का पहला झंडा फहराया था। उन्होंने अनेक विश्व विख्यात पुस्तकों का लेखन भी किया, जैसे १९२९ में जेल में रहकर ‘पिता के पत्र : पुत्री के नाम’, १९३३ में विश्व इतिहास की झलक (गिल्ंम्प्सेज ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री), १९३६ में मेरी कहानी (एन ऑटोबायोग्राफी) और १९४५ में भारत की खोज (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) आदि। उन्होंने अपने युवाकाल का अधितर हिस्सा जेलों में बिताया और उसी दौरान ज्यादातर किताबों का सृजन भी किया।
जवाहरलाल नेहरु की पुत्री इंदिरा गांधी ने भी अपने जीवन की शुुरुआत भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सेदारी के साथ की थी। उन्होंने बच्चों की वानर सेना बनायी थी, जो कांग्रेस के आंदोलनकारियों के गोपनीय पत्रों को लाने-ले जाने के काम में मदद करती थी। ऑक्सफोर्ड से शिक्षा लेने के बाद १९४१ में भारत वापस आने पर वे भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में पुनः शामिल हो गयीं। बाद में वे देश की प्रधानमंत्री बनीं और दुनिया में उनका यश फैला। पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में ९३ हजार सैनिकों को इन्ही ंके कार्यकाल में सेना ने युद्धबंदी बनाया था। उन्होंने बांग्लादेश नाम का एक नया मुल्क संसार के नक्शे में पैदा करने में मदद की और तीसरी दुनिया का नेतृत्व भी किया। भारत में खालिस्तान बनाने के पाकिस्तानी इरादों को चकनाचूर किया और बदले में ३१ अक्टूबर १९८४ को अपनी शहादत दी।
संजय गांधी की मृत्यु के बाद राजीव गांधी राजनीति में आये और प्रधान मंत्री बने। उन्होंने इक्कीसवीं सदी के लिये भारत को तैयार किया। तमिल आतंकवादियों के षडयंत्र के चलते वे २१ मई १९९१ को शहीद हुए। कांग्रेस का नेतृत्व पी वी नरसिंह राव के हाथों में पहुंचा और कांग्रेस के लिये राजनीतिक संकट का काल भी शुरु हुआ। कई प्रदेशों में कांग्रेस को पराजय मिली। कांग्रेस के टुकड़े हुए। ऐसे में कांग्रेस-जनों की दीर्घकालिक मांग को पूरा करते हुए श्रीमती सोनिया गांधी ने १९९७ में राजनीति में प्रवेश किया और १९९८ में कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष निर्वाचित हुईं। कांग्रेसनीत यूपीए को २००४ में देश की सत्ता दिलायी। उन्हें नेता चुना गया, परंतु उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया। २००९ में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत दिलाया और एक बार फिर प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया।
२०१४ के आम चुनाव में कांग्रेस पराजित हुई। राहुल गांधी ने विपक्ष की भूमिका में अपनी सार्थकता सिद्ध की। भाजपा द्वारा भारतीय राजनीति में फैलाये गये झूठ के प्रदूषण का पुरजोर विरोध किया और कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित होने के एक साल के अंदर ही कांग्रेस को हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में सत्ता दिलायी।
प्रियंका गांधी २००४ से ही सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र में उनकी प्रबंधक के तौर पर काम करती रही हैं। बाद में उन्होंने राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र में भी प्रचार कार्य किया। अब वे कांग्रेस की महासचिव हैं और पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी भी। वे राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से भागीदारी करने से असहमत रही हैं, परंतु जिस पार्टी को बनाने-संवारने में उनके पूर्वजों का अपरिमित योगदान रहा हो, यदि वह संकट में पड़ी हो, तो वे चुप रहकर देखती तो नहीं रह सकती थीं, लिहाजा वे अब सक्रिय राजनीति में आ गयी हैं।
याद दिला दें कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने उस वक्त पार्टी में अहम् भूमिका का निर्वाह करना स्वीकारा, जब पार्टी के सामने विराट चुनौतियां आ खड़ी हुईं। पर जब २००९ में संसद में पार्टी बहुमत में आयी थी, तो न सोनिया जी प्रधान मंत्री बनीं थीं और न ही राहुल गांधी। अब पार्टी और पार्टी नेतृत्वकर्ता जनता के बीच में जा रहे हैं। अपनी बातें रख रहे हैं। यही लाकतांत्रिक पद्धति है। २०१९ के चुनाव के जरिये देश की जनता ही तय करेगी कि उसे राहुल-प्रियंका के नेतृत्व वाली कांग्रेस को सत्ता सौंपनी है या छल, कपट और झूठ की राजनैतिक खेती करने वालों को।
इतिहास याद रखेगा कि मुल्क के तीन गांधियों ने कुरबानियां देकर देश बनाया और उसी मुल्क के चार मोदियों ने देश लूटकर विदेशों में घर जा बनाया। यही है इतिहास में परिवार और परिवार के इतिहास का असली अंतर।
-रामेश्वर नीखरा, पूर्व सांसद