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स्वास्थ्य बीमा ‘आयुष्मान भारत’ के दायरे में पूरे मध्यवर्ग को लाने की तैयारी

नई दिल्ली (ईएमएस)। मोदी सरकार की मध्यवर्ग से जुड़ी स्वास्थ्य बीमा ‘आयुष्मान भारत’ योजना को लेकर सरकार में नई कवायद चल रही है। देश के 10 करोड़ से ज्यादा गरीब परिवारों को मुफ्त इलाज की सुविधा देने वाली ‘आयुष्मान भारत’ योजना के दायरे में मध्यवर्गीय सहित सभी को लाने की तैयारी है। सूत्रों के मुताबिक, 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद मोदी सरकार किसी भी समय इसका ऐलान कर सकती है। सभी नागरिकों को स्वास्थ्य बीमा देने की इस योजना के लिए फंड की कमी न हो, इसके लिए सरकार लोगों से प्रीमियम की रकम लेने पर भी विचार कर रही है।
अभी गरीबों को मुफ्त इलाज पर प्रति परिवार 1,100 रुपये खर्च आने का आकलन है। इसका खर्च केंद्र व राज्य सरकार उठाती है। इस योजना की रूपरेखा तैयार करने वाले एक वर्ग का विचार है कि अगर इस हेल्थ इंश्योरेंस के लिए बाकी लोगों से प्रति परिवार 2,200 रुपये सालाना प्रीमियम भी लिया जाए तो इतना फंड होगा कि सरकार के लिए यह योजना एक तरह से फ्री हो जाएगी। हेल्थ कवर का दायरा 5 लाख से ज्यादा चाहिए तो ‘टॉप-अप’ की सुविधा देने पर भी विचार हो रहा है। 25 सितंबर को शुरू की गई आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के दायरे में अभी सरकार के पैनल में शामिल किसी भी सरकारी या प्राइवेट अस्पताल में 5 लाख रुपये तक के मुफ्त कैशलेस इलाज की सुविधा है। लाभार्थियों की सूची में फिलहाल 10.74 करोड़ गरीब परिवारों यानी 50 करोड़ से ज्यादा की आबादी को रखा गया है। पहले संकेत थे कि मोदी सरकार 2019 का चुनाव जीतने के बाद इस योजना के दायरे में सभी को लाएगी, लेकिन सरकार को 2019 की डगर मुश्किल लगी तो विधानसभा चुनाव के बाद इस योजना के दायरे में सभी को लाने का भाजपा पर दबाव बढ़ता जा रहा है। सरकारी सूत्रों को लगता है कि यह दांव मोदी सरकार के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है।
अपने यहां बेहतर योजना की दलील देकर दिल्ली, तेलंगाना, ओडिशा, केरल और पंजाब ने आयुष्मान भारत को नहीं अपनाया है लेकिन दिल्ली के नामी प्राइवेट अस्पतालों को इस योजना से जोड़ने का काम केंद्र सरकार शुरू कर चुकी है, जिसका फायदा दिल्ली के पड़ोसी राज्यों से आ रहे मरीजों को मिलेगा। इस पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल ने कहा कि सभी नागरिकों को आयुष्मान भारत योजना के दायरे में लाना राहत की बात होगी। रहा सवाल नामी अस्पतालों के शामिल न होने का तो सरकार संविधान की धारा 47 का प्रयोग कर उन्हें मजबूर कर सकती है।

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