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ग़ाजियाबाद

खत्म हुआ मतदान मगर राहें इतनी भी नहीं हैं आसान कई वार्डों में मिल रही है भाजपा को कड़ी चुनौती

वरिष्ठ संवाददाता (करंट क्राइम)

गाजियाबाद। जिला पंचायत चुनाव में इस बार सभी सियासी दल अपने-अपने समर्थन के साथ आये। सभी ने अपने-अपने उम्मीदवार उतारे और यहां पर सबसे बड़ा फोकस भाजपा का रहा। भाजपा ने सपोर्ट किया और उसके वोट का भी एक अनुमान था। इसकी वजह यह है कि भाजपा केन्द्र में है भाजपा प्रदेश में है। उसने चुनाव के लिए पहले से योजना बना रखी थी। उसके संगठन से लेकर महिला मोर्चा, किसान मोर्चा बाकायदा समर्थित उम्मीदवारों के समर्थन में चुनाव प्रचार के लिए मैदान में उतरे।
गुरूवार को प्रथम चरण के चुनाव में गाजियाबाद में मतदान सम्पन्न हो गया। प्रथम चरण में त्रिस्तरीय चुनाव में जिला पंचायत सदस्य से लेकर ग्राम प्रधान तक मतदान हुआ। खास बात यह रही कि कोरोना और गर्मी दोनों के ही इफेक्ट को ग्रामवासियों ने नहीं माना और यहां कुल 74.33 प्रतिशत मतदान हुआ है। सर्वाधिक मतदान मुरादनगर ब्लॉक में 79.16 प्रतिशत और सबसे कम मतदान रजापुर ब्लॉक में 68.16 प्रतिशत हुआ है। मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया है और जो तस्वीर मतदान के बाद निकलकर आ रही है वो इस बात के संकेत दे रही है कि भाजपा के लिए राहें इतनी आसान नहीं हैं जितनी भाजपा मानकर चल रही है। यहां पर उसे कई वार्डों में कड़ी टक्कर मिल रही है तो कई वार्डों में 50-50 का गेम है।

सपोर्ट वाली कुल्हाड़ी और टक्कर है करारी

भाजपा को वार्ड नं-1 और 2 में कड़ी चुनौती मिल रही है। वार्ड संख्या-3,4,5 में भी भाजपा के लिए सीन आसान नहीं हैं। ये इलाके मोदीनगर के हैं और यदि मुरादनगर पर फोकस करें तो यहां वार्ड-6 और 8 पर तो भाजपा ने कैंडिडेट ही नहीं उतारे। वार्ड-7 पर उसने पुष्पेन्द्र चौधरी को कुल्हाड़ी के निशान पर समर्थन दिया है। सूत्र बताते हैं कि यहां पर भी टक्कर कांटे की रही है। पुष्पेन्द्र के लिए भाजपा ने मेहनत की है और पुष्पेन्द्र मजबूती से चुनाव लड़ें हैं लेकिन उन्हें यहीं से दूसरे उम्मीदवार ने कांटे की टक्कर दी है।

फ्री हैंड वाले वार्ड में भीचुनावी मुकाबला हार्ड

चुनाव यहां काफी रोचक हो गया है। वार्ड-6 और 8 पर भाजपा के लिए फ्री हैंड वाला सीन है। यहां चर्चा यही है कि जो जीता वही हमारा वाला सीन भाजपा कर लेगी। यहां मुकाबला भी भाजपा बनाम भाजपा है। वार्ड-6 से पूर्व कैबिनेट मंत्री राजपाल त्यागी की पुत्रवधु रश्मिी त्यागी चुनाव लड़ीं हैं और सूत्र बता रहे हैं कि उन्हें यहां पर बसपा और सपा से टक्कर मिल रही है। वार्ड-8 पर पूर्व कैबिनेट मंत्री राजपाल त्यागी के पौत्र मोहित त्यागी को भी इस सीट पर संघर्ष करना पड़ा है। सीन टाईट है और चुनावी फाईट है, किसी भी सीट पर चुनाव किसी एक के पक्ष में एक तरफा नहीं है।

पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष के वार्ड में मावी फैक्टर हावी

वार्ड-12 पर भी भाजपा के लिए चुनाव फंसा हुआ है। बताते हैं कि यहां प्रदीप कसाना ने जावली इफेक्ट के साथ बेस्ट फाईट की है। इस वार्ड में अन्य उम्मीदवारों ने भी मजबूती के साथ चुनाव लड़ा है। वार्ड-13 पर भाजपा नेता ईश्वर मावी की पुत्रवधु अंशु मावी भाजपा सपोर्ट के साथ चुनाव लड़ी हैं। इसी वार्ड से पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष लक्ष्मी मावी भी बागी होकर चुनाव लड़ी हैं। उन्हें भाजपा ने बीच चुनाव में पार्टी से निष्कासित किया। लक्ष्मी मावी यहां चुनाव मैदान में थी और यहीं से सपा के ललित बंसल और बसपा के अनिल शर्मा भी चुनाव लड़े हैं। माना जा रहा है कि यहां पर मावी फैक्टर मजबूत रहा है। अब कौन से मावी को ये फैक्टर मजबूती दे रहा है ये समझने वाले समझ रहे हैं। बताया जाता है कि एक मावी चेहरे ने चुनाव से ठीक एक दिन पहले सधी हुई रणनीति के तहत चुनाव को साधा था और इसके इफेक्ट चुनाव पर पड़ रहे हैं। यहां पर बसपा और सपा गेम चेंजर हैं। यदि बसपा और सपा ने मजबूती से चुनाव लड़ा तो फिर चुनाव के नतीजे बहुत ही अप्रत्याशित आ सकते हैं।

वार्ड-14 में भी भाजपा के लिए नहीं है एकतरफा लहर

वार्ड-14 लोनी का इलाका है और भाजपा के लिए सियासी रूप से ये वार्ड काफी मायने रखता है। यहां से भाजपा के क्षेत्रीय उपाध्यक्ष बसंत त्यागी की पत्नी ममता त्यागी भाजपा समर्थित उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ी हैं। ममता त्यागी पहले भी जिला पंचायत सदस्य रहीं हैं और ममता त्यागी को उम्मीदवार बनाने पर बसंत त्यागी ने जिला पंचायत चुनाव के संयोजक पद से इस्तीफा दिया था। सूत्र बताते हैं कि ममता त्यागी जिला पंचायत अध्यक्ष पद की प्रबल दावेदार अभी से मानी जा रही हैं। लेकिन चुनाव इस वार्ड में भी एक तरफा नहीं हुआ है। यहां पर ममता त्यागी को कई निकटतम उम्मीदवारों से कड़ी टक्कर मिल रही है। इनमें बिरादरी के उम्मीदवारों से लेकर गुर्जर बिरादरी के उम्मीदवार शामिल हैं।

9-10-11 में चुनाव दे रहा है मिक्स मैसेज

वार्ड-9,10,11 को मिश्रित वोट बैंक का इलाका माना जाता है। यहां दलित वोट कई वार्डों में निर्णायक भूमिका में है तो कई अन्य जातियां भी चुनाव का रूख तय करती हैं। यहां पर मतदाताओं ने भी उत्साह के साथ भाग लिया है। मतदान के बाद जो रूझान मिल रहे हैं वो बता रहे हैं कि यहां पर भी भाजपा की सपोर्ट अलग बात है और उम्मीदवार को मिला वोट अलग बात है। यहां से एक मिक्स संदेश आ रहा है। क्योंकि यहां पर गांव, बिरादरी पहले है और राजनीतिक दल बाद में हैं।

भाजपा को मिली है किसान आंदोलन से भी चुनौती

भाजपा ने होने वाले सियासी डैमेज को पहले ही मैनेज करने की कोशिश की थी। उसने अपने जाट चेहरों को इसी बेल्ट में उतारा था। अब जब गुरुवार को जिला पंचायत के पहले चरण का चुनाव हुआ तो यहां भाजपा को किसान आंदोलन वाले मुद्दे से चुनौती मिलती दिखाई दे रही है। चुनाव के नतीजे यदि भाजपा के पक्ष में रहे तो भाजपा यह कह सकती है कि किसान उसकी नीतियों से सहमत हैं और यदि नतीजा भाजपा के खिलाफ गया तो माना जायेगा कि भाजपा किसान आंदोलन की नाराजगी को दूर नहीं कर सकी। क्योंकि ये चुनाव राजनीतिक दलों का नहीं होता है। ये चुनाव बिरादरी और समीकरण का चुनाव माना जाता है। फिलहाल भाजपा को यहां पर कड़ी टक्कर मिलती दिखाई दे रही है।

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