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ग़ाजियाबाद दिल्ली एन.सी.आर

राजनीति के 6 M

जनीति की परिभाषा क्या है, इसको भले ही हर नेता ठीक से परिभाषित न कर पाये, लेकिन बदलते दौर में राजनीति की परिभाषा 6 एम पर आकर केंद्रित हो गई है। अब वही बेहतर पॉलीटिशियन कहलाता है जिसको 6 एम को साधे रखने में महारत हासिल हो गई है। राजनीति का ताजा करंट ही 6 एम का फॉर्मूला है, और यह फॉर्मूला देश-प्रदेश क्या गाजियाबाद में भी बखूबी से दोहराया जा रहा है। आज हर वह नेता 6 एम का प्रयोग कर रहा है जो धनबल से सम्पन्न है। नेता की यही सम्पन्नता उसके लिए राजनीति के नये द्वार खोल रही है। वह पल भर में पहचाना जाने लगा है। उसके लिए वरिष्ठ भी कुर्सी छोड़कर खड़े हो रहे हैं। उसके घर पर मंत्री लंच करने पहुंचते हैं। उसके होर्डिंग्स शहर को एक नया राजनीतिक लुक देते हैं। 6 एम की महिमा से सधा हुआ नेता इतना काबिल हो जाता है कि उसके पीछे चाटूकारों की लंबी फौज पलभर में आ खड़ी होती है। दल भाजपा हो, बसपा हो, सपा हो या फिर कांग्रेस के साथ कोई भी पार्टी क्यों न हो सभी में आज 6 एम के फॉर्मूला का बोलबाला है और वही नेता इन पार्टियों में सरवाईव कर रहा है, जो इस कला में माहिर है। आज भाजपा में मेयर के लिए एक ऐसे शख्स का नाम सुर्खियों में है जिसने न भाजपा के लिए कभी झंडा उठाया न पुलिस के डंडे खाये। बस इस दावेदार की महानता यह है कि इसके पास 6 एम का फॉर्मूला है। कांग्रेस में भी टिकट को लेकर ऐसे ही नाम सामने आते हैं जो इस फार्मूले को अपने साथ लेकर चल रहे हैं। इस फॉर्मूले की वजह से दरी बिछाने वाले, भीड़ जुटाने वाले, दिवारों पर पोस्टर लगाने वाले वर्कर विलुप्त हो चुके हैं, क्योंकि 6 एम से अब इन सभी चीजों की प्रीपेड व्यवस्था हो जाती है। सपा में भी 6 एम वाले नेता ही आज प्रमुख पदों पर हैं। प्रधान चुनाव हो, जिला पंचायत सदस्य चुनाव हो या फिर वर्तमान में जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव ही क्यों न हो 6 एम यहां पर पूरी तरह से हॉवी होता नजर आ रहा है। राजनीति में जल्द सफलता प्राप्त करने के लिए यह फार्मूला भले ही कारगर साबित हो रहा हो, लेकिन इसके प्रभाव भविष्य में काफी नाकारात्मक परिणाम पेश करेंगे, क्योंकि जो चीज 6 एम के बूते होगी उसमें भावनाओं का सम्मान नहीं रहेगा, और इसकी वजह से ग्राउंड लेवल की राजनीति करने वालों का करंट खत्म होता चला जायेगा। राजनीति के ये 6 एम आज पूरी तरह से अपनी जड़ जमा चुके हैं। एम से मनी होती है, मनी से मैनेजमेंट होता है, मैनेजमेंट से मंच मिलता है, मंच से बोलने के लिए एम से माईक मिलता है और जब बोलने की कला आ जाती है तो एम से माला डालने वालोें की भी लंबी कतारें एक ऐसे व्यक्ति का कद बढ़ा देती है जिसने जनता की सेवा के नाम पर एम से मक्खी भी नहीं मारी होती है। वह एम से मीडिया में आकर राजनीतिक हो जाता है। राजनीति की बदलती इस परिभाषा को हम वर्ष 2015 और उससे पहले से ही देखते हुए आ रहे हैं। ऐसे में नये वर्ष में हम यह सोचें कि यह फॉर्मूला बदलेगा ऐसी सम्भावनाएं कम ही नजर आती हैं। हालांकि आज भी राजनीति में ऐसे कईं नेता हैं जिन्होंने इस फॉर्मूले को न अपनाकर अपनी अलग पहचान स्थापित की है। ऐसे नेताओं के अब सामने आने की जरूरत है और अगर ऐसा नहीं होता है तो यह फॉर्मूला इसी तरह से फलता-फूलता रहेगा और जनता के प्रति काम करने का करंट धीरे-धीरे फ्यूज हो जाएगा। 6 एम 2016 में क्या असर दिखाता है यह देखना बाकी है। फिलहाल आप सभी को मेरी ओर से नववर्ष 2016 की हार्दिक शुभकामनायें।

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