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जनप्रतिनिधि के प्रतिनिधि के 90 हजार वाले फोन चोरी होने की अजब है पीर

फरवरी में चोरी हुआ था और गायब हो गयी थाने से तहरीर
गाजियाबाद (करंट क्राइम)। पुलिस का काम अपराधियों को पकड़ना है और चेन स्रैचिंग और मोबाईल चोरी की वारदातों का भी खुलासा करना पुलिस का काम है। विगत दिनों पुलिस ने कई चेहरों पर उस समय मुस्कान खिलाई थी जब फोन चोरी का शिकार हुए लोगों को थाने बुलाकर उनके फोन उन्हें सौंपे गये। लेकिन ऐसा हर बार नहीं होता है और यहां तो पॉवर वाले के साथ पुलिस ने ऐसा तार मिलाया कि करंट का झटका दूर तक लगा।
जिसकी सरकार होती है उसे उम्मीद होती है कि वह सरकार है तो उसके पास पॉवर वाली तार है। बताते हैं कि किस्सा फरवरी महीने से जुड़ा है और घटना स्थल भी एक थाने के बैक साईड वाला मौहल्ला है। सूत्र बताते हैं कि थाने के बराबर में भाजपा की मीटिंग थी और यहां एक जनप्रतिनिधि के प्रतिनिधि भी पहुंचे थे। इस कार्यक्रम में किसी ने उनकी जेब से उनका महंगा मोबाईल फोन चोरी कर लिया। फोन की कीमत लगभग 90,000 थी। अब चोर को क्या पता कि फोन किसका है। उसे तो चुराने से मतलब। लेकिन सितम तो ये हुआ कि पुलिस ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया कि फोन किसका है। फूल वालों का फूल बना और उन से कह दिया गया कि आप तहरीर लिखकर दे दो। प्रतिनिधि ने तहरीर लिखकर दे दी और उन्हें दीवान जी ने ठप्पा मारकर एक कॉपी दे दी।
अब प्रतिनिधि तो निश्चित थे कि पुलिस उनके फोन को सर्विलांस पर लगायेगी और रिपोर्ट दर्ज होगी। पुलिस उन्हें बतायेगी कि आपका फोन बरामद हो गया है। मगर सरकार में सब बदले होंगे पुलिस नहीं बदली है। इसका एहसास भी तब हो गया जब कुछ दिन बाद प्रतिनिधि ने यह जानकारी लेने के लिए पुलिस विभाग में फोन किया कि उनका फोन सर्विलांस पर लगा कि नहीं लगा। अब करंट का झटका प्रतिनिधि को लगा क्योंकि जो तहरीर विद बिल वह थाने में देकर आये थे और जिसकी रिसीविंग कॉपी उनके पास थी वो तहरीर तो खो चुकी थी। पुलिस ने तो कोई मुकदमा दर्ज ही नही किया था। सर्विलांस तो दूर की बात थी।
सूत्र बताते हैं कि इसके बाद मामला बड़े पुलिस अधिकारी के पास पहुंच गया और जब उन्होंने कोतवाल से कहा तो भी सिस्टम वो ही रहा। अब तहरीर खो गयी तो खो गयी वाली स्टाईल में दरोगा ने प्रतिनिधि से कह दिया कि आपके पास मोहर लगी तहरीर की कॉपी होगी, वह आप हमें दे दो उसी के आधार पर मुकदमा दर्ज हो जायेगा। लेकिन इतने दिन तहरीर में तारीख के गैप पर पुलिस भी खामोश रही। मामले का करंट ये है कि सरकार के बेहद नजदीक रहने वाले प्रतिनिधि का चोरी हुआ फोन आज तक नहीं मिला है। कमाल ये भी है कि प्रतिनिधि ने भी इस बात का जिक्र किसी से नहीं किया।
बात तो थाने के सूत्रों से ही बाहर निकलकर आ गयी और बातों बातों में ये बाहर आ गया कि फोन की तहरीर को लेकर उन्होंने बड़े साहब को फोन कर दिया था। इसलिए तहरीर संभाल कर रखना। सूत्र बताते हैं कि एक जुल्म ये भी हुआ है कि जनप्रतिनिधि को इस पूरे मामले की खबर ही नहीं है। उन्हें पता ही नहीं है कि उनके सबसे प्रिय प्रतिनिधि के साथ पुलिस ने क्या इमोशनल अत्याचार कर दिया है।
लो कर लो बात अब तक उनका नहीं लगा सुराग
बात जब महकमे से बाहर आई है तो फिर पुरानी तहरीरें भी निकल रही हैं। जब आशा शर्मा मेयर भी नहीं बनी थी तब बाईक सवार बदमाशों ने उनका पर्स लूट लिया था। मीना भण्डारी पार्षद बन गयी थीं और बाईक सवार बदमाश उनकी चेन लूटकर भाग गये थे। विधायक रहते हुए नन्दकिशोर गुर्जर की कार पर हमले का मामला था और तत्कालीन पुलिस अधिकारी ने कार ही फारेंसिक जांच को भेजने की बात कही थी। महानगर कोषाध्यक्ष संजीव गुप्ता की फैक्ट्री में लाखों रूपये का माल चोरी हो गया था। मानसिंह गोस्वामी का मोबाईल फोन बाईक सवार ले गये थे। ऐसे तो कई मामले हैं और जब इनका ही सुराग नहीं लगा तो प्रतिनिधि का फोन भला पुलिस कैसे तलाश सकती है।

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