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राजनीति

पिछले 43 साल में 87 बार टूटी पार्टियां

– भाजपा से अलग होकर 17 नेताओं ने बनाई पार्टियां
– नेताओं की सत्ता की भूख नई पार्टियों की जन्मदाता
– कुछ ही अस्तित्व में रह गई बाकी खत्म हो गई
नई दिल्ली। पिछले 5 दशकों में दलबदल का खेल भारत की रानीति में शुरू हुआ। हरियाणा से कई दशक पहले शुरू हुआ आयाराम और गयाराम का यह खेल पिछले चार दशकों में काफी फला फूला। इसमें कई केंद्र और राज्य सरकारें बनी और बिगड़ी। दलबदल कानून भी लाया गया। नेताओं के कौशल के आगे दलबदल कानून भी निष्फल साबित हुआ। पिछले वर्षों में जिस तरह से विधायकों और सांसदों को तोड़कर सत्ता में काबिज होना अथवा नई पार्टियां बनाकर सत्ता में भागीदारी का खेल अब चरम पर पहुंच गया है। पिछले चार दशक में 48 बार कांग्रेस पार्टी 22 बार जनता दल और 17 बार भाजपा से अलग होकर नेताओं ने राजनीतिक दल बनाये। उसमें से कुछ ही अस्तित्व में रह गए। बाकी सब 1 से 2 वर्षों में समाप्त हो गए।

17 बार टूटी भाजपा

जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी को कैडर बेस पार्टी माना जाता है। जनसंघ और भाजपा में हमेशा संघ का प्रभाव रहा है। यहां पर जनसंघ एवं भाजपा के नेताओं की कभी कोई बड़ी हैसियत नहीं रही। संघ का केडर ही पार्टी के कामकाज पर नियंत्रण रखता रहा है। इसके बाद भी भाजपा से अलग होकर 17 पार्टियां बनी। यह अलग बात है, कि कुछ दिनों के बाद उनका अस्तित्व नहीं रह पाया। बागी नेता या तो भाजपा में शामिल हो गए या किसी अन्य राजनीतिक दल में चले गए।
भाजपा से निकलकर जिन नेताओं ने अपनी पार्टियां बनाई। उसमें कल्याण सिंह की जनक्रांति पार्टी, उमा भारती की जनशक्ति पार्टी, केशुभाई पटेल की जीपीपी पार्टी, बाबूलाल मरांडी की जेवीएम पार्टी, काफी चर्चित रहीं है। इन्होंने अलग राजनीतिक दल बनाकर भाजपा को चुनौती देकर नाराजी जताई।

कांग्रेस के दिग्गजों ने भी बनाए राजनीतिक दल

स्वतंत्रता के पश्चात से कांग्रेस के नेताओं ने कांग्रेस से नाराज होकर राजनीतिक दल बनाएं। वह कुछ साल तक अस्तित्व में रहे। 70 के दशक में हरियाणा के नेता बंसीलाल भजनलाल और देवीलाल नेतृत्व में बड़े पैमाने पर दलबदल हुए। जिसके कारण राज्य सरकार बनी और बिगड़ी। गुजरात में कांग्रेस जब काफी मजबूत थी, तब भी वहां पर सत्ता परिवर्तन होता रहा। केंद्र और राज्य में पूर्ण बहुमत की कांग्रेस सरकार होने के बाद भी गुजरात में सबसे ज्यादा बार राष्ट्रपति शासन लगने का रिकॉर्ड है। जहां नेता सत्ता पाने के लिए दल-बदल कर या नया दल बनाकर सत्ता में भागीदारी करते हैं।

कांग्रेस के दिग्गज नेता एके एंटनी ने 1980 में कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस ए बनाई थी। माधवराव सिंधिया ने 1996 में कांग्रेस छोड़कर एमपीबीसी नामक पार्टी बनाई थी। 1986 में प्रणब मुखर्जी ने भी एनएससी नामक पार्टी बनाई थी। पी चिदंबरम ने 2001 में सीजेपी के नाम से राजनीतिक दल बनाया था। इसके अलावा तृणमूल, एनसीपी, वाईएसआर कांग्रेस, पीडीपी, छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस, एआईएनआर कांग्रेस, एनपीएफ, विदर्भ जनता कांग्रेस, तमिल मनीला कांग्रेस नामक राजनीतिक दल कांग्रेस के नेताओं ने पार्टी छोड़कर बनाएं। इसमें कुछ ही अस्तित्व में रह गए, बाकी कुछ समय के अंदर ही यह राजनीतिक दल खत्म हो गए। कांग्रेस के विरोध में तीसरा मोर्चा बनाकर कई बार कांग्रेस को चुनौती देने के लिए राजनीतिक दलों का विलय हुआ। कुछ समय के बाद ही सत्ता की लड़ाई ने नेताओं को अलग राजनीतिक दल बनाकर अपनी नाराजगी अथवा सत्ता में भागीदारी करने का एक लंबा इतिहास भारत के रानेताओं का हैं।

जिस तरह से कांग्रेश पार्टी से निकलकर नेताओं ने बहुत सारी राजनीतिक दल बनाएं। उसी तरह जनता दल से निकलकर क्षेत्रिय राजनीतिक दल बनाकर क्षेत्रीय नेताओं ने सत्ता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। भारतीय राजनीति में विचारधारा का कोई स्थान नहीं रहा। सत्ता में बने रहने के लिए सुविधानुसार पार्टी बदलना अथवा दलबदल कानून से बचने के लिए संख्या बल के आधार पर नया दल बनाकर सत्ता पाना ही विधायकों एवं सांसदों का एकमात्र लक्ष्य होता है।

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