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मस्त रहने वाले बुजुर्गों के पास भी नहीं फटकती डिमेंशिया जैसी बीमारी

न्यूयॉर्क (ईएमएस)। जिंदादिली उम्र की मोहताज नहीं होती। उम्र 80 की हो या 50 की,कुछ लोग मस्त जीवन जीते हैं, इस उम्र में भी लोगों का वजन बढ़ता है। ऐसे लोगों के मस्तिष्क में डिमेंशिया कारक परिस्थितियां हो तो भी इन्हें यह गंभीर बीमारी छू भी नहीं पाती है। इस बात ने विशेषज्ञों को हैरत में डाल रखा है। 80 से 100 साल के ‘सुपर एजर्स’ पर हाल ही में शोध किया गया। एमिली रोगालस्की का कहना है कि उम्र के इस दौर में भी जिंदादिल रहने वाले लोगों का मस्तिष्क चमत्कारिक रूप से काम करता है। कई मामलों में तो इनका मस्तिष्क 50 साल के लोगों से भी बेहतर होता है। शोधकर्ताओं ने देखा कि इस उम्र में सक्रिय लोगों के मस्तिष्क में वॉन इकोनोमो न्यूरॉन अधिक मात्रा में पाया जाता है। उनका कहना है कि इन न्यूरॉन की वजह से दिमाग विभिन्न हिस्सों में बेहतर तालमेल होता है। शिजोफ्रेनिया, ऑटिज्म और बाइपोलर डिसऑर्डर के शिकार लोगों में यह न्यूरॉन सक्रिय नहीं होता है। इसके अलावा जीवन के प्रति इनका सकारात्मक नजरिया, सक्रियता और सामाजिक व्यवहार भी बहुत असर डालता है। शोधकर्ताओं ने बताया कि ऐसा नहीं है कि इनमें डिमेंशिया के प्रति अवरोध उत्पन्न करने वाला एपीओई 22 जीन मौजूद था। मगर जीवन के प्रति इनका नजरिया औरों के मुकाबले सकारात्मक था। इन्हें अपने करीबियों और परिवारीजनों की अधिक फिक्र थी। इनके इस नजरिये का खानपान से कोई संबंध नहीं था। एमिली ने रविवार को अपने शोध के नतीजे पेश किए।

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