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मंदिर मुद्दे पर अपने ही बुने मकड़ जाल में तो नहीं फंस रहा है संघ? (लेखक-सनत

( ईएमएस)लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की भूमिका सर्वोपरि होती है। जहां से जनता का शासन, जनता के लिये जनता द्वारा परिभाषित परिभाषा का स्वरूप परिलक्षित होता है। इस व्यवस्था में जनता द्वारा चुने गये जनप्रतिनिधि लोकतंत्र में सर्वशक्तिमान होते है, जिनका लोकतांत्रिक व्यवस्था पर नियंत्रण होता है। जिनसे देश की हर व्यवस्था नियंत्रित एवं संचालित होती है। इस तरह के परिवेश में जिस तरह के जनप्रतिनिधि होंगे, व्यवस्था भी उसी तरह की बन पायेगी। कहा भी गया है जैसा खाओं अन्न, वैसा होगा मन ! विद्वान,चारित्रवान वैचारिक विवेक एवं सुविचार वाले जनप्रतिनिधि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रवेश करेंगे तो निश्चित तौर पर देश की प्रशासनिक व्यवस्था का बेहतर स्वरूप उजागर हो सकेगा, हर कदम विकास की ओर सही मायने में अग्रसर होते दिखेंगे। इस परिवेश में यदि समाज के असमाजिक तत्व जिनपर इस व्यवस्था द्वारा नियंत्रण किया जाना है, वहीं प्रवेश कर जायेंगे तो लोकतांत्रिक ढांचा का बिगड़ना स्वाभाविक है। जहां निष्पक्षता की बात कर पाना कतई संभव नहीं। आज देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में कुछ इसी तरह के दागी अर्थबल एवं बाहुबल के संयुक्त प्रयास से घुस आये है, जो पूरी व्यवस्था को स्वहित में बिगाड़ रखे है। आज देश में पनपता भ्रष्टाचार, पक्षपात, अनैतिकता एवं हर दिशा में अनियंत्रित बागडोर इसका ही प्रतिफल है। आज देश की विधायिका के बदले हालात जहां इनकी उपस्थिति अमर्यादित परिवेश को उजागर हर पल करती रहती है जिसे देश ही नहीं विदेश की आम जनता आसानी से देख रही है। जिनसे प्रशासनिक व्यवस्था भ्रष्ट एवं अनियंत्रित होने का परिवेश उजागर होता है। जहां गलत कार्यो को बढ़ावा एवं देश में असमाजिक प्रवृतियों के लोगों के मन में डर एवं भय बिल्कुल समाप्त हो जाता है। आज इस तरह के उभरते परिवेश के कारण ही भ्रष्टाचार हर दिशा में बढ़ता ही जा रहा है, अपराधिक प्रवृ‎त्ति में वृद्धि होती जा रही है। देश में महंगाई बढ़ना एवं आम जन के मन में असुरक्षा की भावना का पैदा होना स्वाभाविक हो गया है। चुनाव दिन पर दिन ऐसे लोगों के चलते ही महंगे होते जा रहे है जहां आज देश का आम सभ्य नागरिक का प्रवेश वर्जित है। ऐसे परिवेश में न तो अच्छे लोग आगे आना चाहता है, न आ पाते है। इस तरह के लोग जिनसे लोकतांत्रिक व्यवस्था अमर्यादित होती जा रही है, आज लोकतांत्रिक व्यवस्था के हर चरण में प्रवेश कर चुके है।
देश की सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात को माना है कि लोकतंत्र में दागी लोगों का प्रवेश उचित नहीं है पर उसे रोकने के लिये संविधान में संशोधन जरूरी है। पर संविधान संशोधन करने वालों में ऐसे लोगों की यदि बहुतायत है, जिन्हें रोकने हेतु संविधान संशोधन की बात की जा रही हो तो कैसे संभव हो पायेगा? विचारणीय मुद्दा है। आज देश के सभी राजनीतिक दल ऐन – केन प्रकारेण सर्वाधिक सीट हासिल कर लोकतंत्र पर कब्जा जमाना चाहते है। इस तरह के परिवेश के लिये दागी ही क्यों नहीं ? इस मामले में कोई किसी से कम नहीं। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने जा रहे है। इस चुनाव में राजनीतिक दलों द्वारा जनप्रतिनिधियों की तलाश जारी है। एक राजनीतिक दल दूसरे राजनीतिक दल पर अपनी आंखें गड़ाये बैठा है। इनकी अंतिम सूचि में जारी किये गये जनप्रतिनिधियों में दागियों की संख्या किसके पास कितनी है, पता तो चल ही जायेगा। इस तरह के लोग राजनीतिक दल के बाहर भी निर्दलीय रूप में अपना अस्तित्व कायम करने के प्रयास में चुनाव के दौरान देखे जा सकते है। कमाउ पुत दागियों को लोकतंत्र से बाहर रखने को कोई भी राजनीतिक दल तैयार नहीं है और इन्हें रोकने में सुप्रीम कोर्ट भी संविधान के चलते मजबूर है। फिर जनता को ही यह तय करना होगा कि लोकतंत्र से दागी कैसे बाहर हो ? चुनाव के दौरान हो रहे मतदान प्रक्रिया में दल – दल की राजनीति से ऊपर उठकर अच्छे आचरण वाले चरित्रवान बेदाग एवं बुद्धिमान जनप्रतिनिधि को ही अपना मत देकर लोकतंत्र के हिफाजत के लिये चुनें। इस दिशा में आम जनता का निर्णय ही लोकतंत्र के भावी भविष्य को तय करेगा। यदि इस दिशा में जागरूकता आम जनता में आई तो चुनाव परिणाम ही बता पायेंगे कि लोकतंत्र से दागी कितने बाहर हो पाये। यदि अब भी इस बार के चुनाव में दागी हावी रहे तो लोकतंत्र के बिगडते हालात को सुधार पाना नामुमकिन होगा। अब यह देश की जनता को ही तय करना होगा कि लोकतंत्र के सजग प्रहरी जनप्रतिनिधि केसे हो ? आज नहीं तो कल इस दिशा में देश की आम जनता को सकरात्मक निर्णय लेने हीं होगे। देश की जनता द्वारा चुने गये जनप्रतिनिधि हीं लोकतांत्रिक व्यवस्था के संचालक होते है जिनके हाथ में देश की बागडोर होती है। जो लोकतंत्र की दिशा एवं दशा तय करते है। इसी कारण लोकतंत्र के स्वरूप को बिगाडने एवं सवारने में देश की आम जनता की भूमिका काफी महत्वर्पूएा होती है। दागी नेताओं से लोकतंत्र की कभी भी काया पाक नहीं हो सकती। इस तरह के लोगों से देश में अनाचार, एवं हर दिशा में अव्यवस्था फैलेगी ही, जिसे किसी भी कीमत पर रोका नहीं जा सकता। आजकल राजनेताओं द्वारा अभद्रीय भाषाओं का प्रयोग पहले से कुछ ज्यादा ही होने लगा है। संसद एवं ंविधनसभा की गरिमा गिरने लगी है। हर चीज को बलपूर्वक हथियाना एवं स्वहित में अपने मुताबिक हर व्यवस्था को संचालित कराना ऐसे लोगों का मुख्य लक्ष्य होता है। जिससे भ्रष्टाचार एवं अनयमितताओं पर रोक लगाना कतई संभव नहीं।ऐसे लोगों को जनमत द्वारा लोकतंत्र से बाहर देश की जनता हीं कर सकती है। ये सुप्रीम पाॅवर देश की जनता के पास हीं है। वर्तमान विधान सभा चुनाव में इस दिशा में देश की आम जनता को सांचना चाहिए एवं सकरात्मक कदम उठाना चाहिए जिससे लोकतंत्र से दागी बाहर हो सके।
मंदिर मुद्दे पर विजयादशमी के दिन से राम मंदिर निर्माण को लेकर संघ और उसके अनुवांशिक संगठनों ने दबाव बनाना शुरू कर दिया है। पहले यह दबाव सुप्रीम कोर्ट के ऊपर बनाने का प्रयास किया गया। नियमित सुनवाई कर मंदिर निर्माण के पक्ष में न्यायालय जल्द फैसला दे। विजयदशमी के संघ प्रमुख के उद्बोधन के बाद से यह मामला तूल पकड़ गया। साधु-संतों, संघ के अनुषांगिक संगठनों और भाजपा के नेताओं ने इस मुद्दे पर बढ़-चढ़कर बयान देना शुरू कर दिए। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने तो केरल की सभा में सुप्रीम कोर्ट को समझाइश देते हुए यह भी कह दिया, कि न्यायालय को ऐसे निर्णय देना चाहिए, जिनका पालन कराया जा सके। एक तरह से संघ और भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट पर दबाव बनाने का काम किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर विवाद में जनवरी तक सुनवाई नहीं करने का निर्णय करके, यह संदेश दे दिया, कि वह दबाव में कोई काम नहीं करेगी। न्यायालय के निर्णय से यह संकेत भी मिलता है कि न्यायिक व्यवस्था में आस्था का भी कोई स्थान नहीं है। न्यायालय तथ्यों के आधार पर ही निर्णय करने के लिए बाध्य है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई आगे बढ़ाने के लिए, यह भी तथ्य ध्यान में रखा होगा। भारत में आम जनता का विश्वास न्यायपालिका में बना रहे हैं। जिस तरीके का माहौल बनाया गया था। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट कोई भी फैसला देती वह विवादों में होता। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की हर वर्ग अपने अपने तरीके से उसकी व्याख्या कर रहा होता।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेता गिरीराज सिंह, जो केंद्रीय मंत्री भी हैं। उन्होंने बड़ा तीखा बयान दिया। उन्होंने कहा कि अब हिंदुओं का सब्र टूट रहा है। न्यायालय यदि आस्था का ध्यान नहीं रखेगा, तो कुछ भी हो सकता है। सरकार और भाजपा के जिम्मेदार पद पर बैठे हुए लोग जब इस तरह की बयानबाजी करते हैं तो उसकी बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। सुप्रीम कोर्ट के जनवरी में सुनवाई करने के निर्णय के बाद से, अब सरकार के ऊपर यह दबाव बनाया जा रहा है, कि सरकार अध्यादेश लाकर मंदिर निर्माण का कार्य शुरू कराए।
25 साल पहले आया था अध्यादेश
6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा गिरा दिया गया था। उसके बाद देश में काफी दंगे और खून खराबा हुआ। तत्कालीन नरसिन्हा राव सरकार ने 7 जनवरी 93 को राष्ट्रपति से मंजूरी लेकर, मंदिर निर्माण के लिए एक अध्यादेश जारी किया था। इसे अयोध्या अधिनियम के नाम से जाना गया। तत्कालीन केंद्र सरकार ने 2.77 एकड़ विवादित भूमि के साथ इसके चारों ओर 60.70 एकड़ भूमि अधिग्रहित की थी। कांग्रेस की सरकार, इस जमीन को अयोध्या में राम मंदिर, मस्जिद, लाइब्रेरी म्यूजियम और अन्य सुविधाओं के निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहित की थी। इस अध्यादेश का सबसे ज्यादा विरोध भारतीय जनता पार्टी ने किया। भाजपा के तत्कालीन उपाध्यक्ष एमएस भंडारी ने इस अध्यादेश को पक्षपातपूर्ण बताते हुए इसे खारिज कर दिया। नरसिंहा राव सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से भी इस मसले पर सलाह मांगी थी। पांच जजों की खंडपीठ ने इस पर विचार किया। किंतु कोई जवाब सरकार को नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत के आधार पर जमीन के मालिकाना हक से संबंधित कानून पर स्टे लगा दिया था। उस समय भी भाजपा ने इसका विरोध किया था।
25 साल पहले राम मंदिर निर्माण का रास्ता अध्यादेश के लिए कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार ने बनाया था। इसका विरोध संसद और संसद के बाहर भारतीय जनता पार्टी ने किया। अब यदि मोदी सरकार अध्यादेश लेकर आती है, तो उसका भी वही हश्र होगा। सुप्रीम कोर्ट का इस मामले में अभी भी स्थगन बना हुआ है।
हर व्यक्ति और हर समूह की आस्था अलग अलग होती हैं। आस्था के अनुसार यदि निर्णय होने लगे, तो फिर भारत में भीड़ तंत्र का कानून चलेगा। भीड़ अपने हिसाब से कानून और नियम बनाने के लिए सरकार और न्यायपालिका पर दबाव बनाएगी। अभी तक यही देखने में आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के शासनकाल में जिन मुद्दों का विरोध करती थी। केंद्र में बनी मोदी सरकार अब कांग्रेसी सरकार के ही पद चिन्हों पर चल रही है। जिससे लगता है कि कांग्रेस के कार्य में बाधा डालने और उसे श्रेय ना लेने देने के लिए राजनीतिक तौर पर भाजपा विरोध करती थी। केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद जिन मुद्दों पर भाजपा विरोध कर रही थी। सरकार बनने के बाद बढ़-चढ़कर काम किया। मनरेगा, विदेशी निवेश, स्वदेशी, जीएसटी कानून, पेट्रोल-डीजल की कीमतें, एफडीआई का विरोध, बीमा बैंक पर निजी निवेश का विरोध करते हुए भाजपा सत्ता में आई थी। लेकिन सत्ता में वापस आते ही सबसे पहले 100 फ़ीसदी विदेशी निवेश की छूट, खुदरा व्यापार, रक्षा, मीडिया एवं अन्य में विदेशी निवेश की 100 फीसदी छूट, जीएसटी कानून लागू करने, मनरेगा की योजना को और व्यापक बनाने, स्वदेशी जागरण मंच के माध्यम से जो विदेशी वस्तुओं का विरोध किया जा रहा था। उन्हीं विदेशी वस्तुओं का सबसे ज्यादा आयात, भाजपा सरकार में हुआ। निर्यात घट गया, अब रही सही कसर मंदिर निर्माण के मुद्दे पर जिस तरह अध्यादेश लाने का प्रयास भारतीय जनता पार्टी और संघ द्वारा किया जा रहा है। उससे लगता है कि संघ अपने ही बुने हुए जाल में फस रहा है।
अध्यादेश को कानून नहीं बना पाने या राममंदिर निर्माण शुरु नहीं हो पाने पर संघ के अनुषांगिक संगठन, हिंदूवादी संगठन, साधु संत सभी सरकार के ऊपर दबाव बनाएंगे। प्रवीण तोगड़िया जैसे नाराज विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अध्यक्ष, मोदी सरकार और संघ की राह में कांटे बिछाने का काम करेंगे। पिछले 30 वर्षों में राम मंदिर निर्माण को लेकर संघ और भाजपा ने जो मकड़जाल बुना था। उससे बाहर निकल पाना अब आसान नहीं है। सत्ता में होने से अब जिम्मेदारी भी है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मोदी सरकार की जवाबदेही बन गई है। ऐसी स्थिति में इस मकड़जाल से वह कैसे बाहर निकल पाएंगे, इसको लेकर सभी के मन में संशय हैं।

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