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अब जानवरों में भी ऐंटीबायॉटिक रेजिस्टेंस, नॉन वेज का सेवन बना घातक

मुंबई (ईएमएस)। अब जानवरों में भी ऐंटीबायॉटिक रेजिस्टेंस बढ़ रहा है और इसके घातक परिणाम नॉनवेज यानि मांसाहार करने वालो में देखने को मिलने लगा है। दरअसल, ऐंटीबायॉटिक हमारे शरीर को बैक्टीरिया के हमलों से बचाता है। साथ ही यह औषधि के रूप में भी काम करता है। मगर इसके अपने कुछ साइड इफेक्ट्स भी हैं। अगर जरूरत से ज्यादा ऐंटीबायॉटिक का इस्तेमाल किया जाए तो शरीर इसकी तरफ प्रतिरोध यानी रेजिस्टेंस विकसित कर लेता है। यानी फिर किसी भी तरह की बीमारी में कोई भी दवा शरीर पर असर नहीं करती। भारत लंबे समय से न्यू दिल्ली मिटालो-बीटा लेक्टेमेस-1 नाम के सुपरबग और ड्रग रेजिस्टेंट टीबी फैलाने के लिए जाना जा रहा है और अब जानवरों में भी ऐंटीबायॉटिक रेजिस्टेंस के मामले में भारत दुनिया का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बनता जा रहा है। भारत के अलावा चीन, पाकिस्तान, वियतनाम, तुर्की, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश भी जानवरों में ऐंटीबायॉटिक प्रतिरोध के हॉटस्पॉट हैं। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी और दिल्ली बेस्ड सेंटर फॉर डिजीज डायनैमिक्स, इकनॉमिक्स एंड पॉलिसी ने साथ मिलकर एक रिव्यू स्टडी की है जिसे साइंस जर्नल में प्रकाशित किया गया है।
इस स्टडी में बताया गया है कि लोअर और मिडिल इनकम वाले देशों में ऐनिमल प्रोटीन की बढ़ती डिमांड को देखते हुए उत्पादन बढ़ाने के मकसद से जानवरों को ऐंटीबायॉटिक दिया जाता है ताकि वे ज्यादा हेल्दी बन सकें। मई 2019 में मुंबई में हुई एक लोकल स्टडी में यह बात सामने आई थी कि चिकन के लिवर वाले मीट और मुंबई के 12 अलग-अलग पोल्ट्री शॉप से इकट्ठा किए गए अंडों में ऐंटीबायॉटिक प्रतिरोध पाया गया। इस स्टडी में बैक्टीरिया सैल्मोनेला के सैंपल्स को टेस्ट किया गया जो दुनियाभर में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर ऐंटीबायॉटिक के प्रति रेजिस्टेंट हो गया है।

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