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बसपा से भाजपा में आये नरेंद्र कश्यप को

नीला रंग तो भाया लेकिन भगवा नहीं सुहाया
वरिष्ठ संवाददाता (करंट क्राइम)

गाजियाबाद। सियासत के बदलते दौर में बहुत कुछ बदला है। कल तक जो कांग्रेस और सपा में थे, आज वो भाजपाई हैं। कांग्रेस की प्रदेशाध्यक्ष रहीं रीता बहुगुणा जोशी आज भाजपा सरकार में कैबीनेट मंत्री हैं। बसपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे स्वामी प्रसाद मौर्य आज भाजपा सरकार में श्रम मंत्री हैं। ऐसे एक नहीं कई चेहरे हैं। बदलती बयार में चुनाव से पहले बसपा के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद रह चुके नरेंद्र कश्यप भी भाजपाई हो गये थे। नरेंद्र कश्यप भाजपा में आने के बाद भी सियासी लिहाज से हाशिये पर ही हैं। उन्हें सियासत में ‘ब’ तो फला लेकिन ‘भ’ नहीं फला। बसपा के ‘ब’ से उन्होेंने शुरुआत स्कूटर से की थी और महंगी लग्जरी कारों का सुख हाथी की सवारी से ही मिला।
बसपा में वह दो बार एमएलसी रहे और संगठन के राष्ट्रीय महासचिव रहने के साथ साथ राज्यसभा सांसद भी बने। कई प्रदेशों के प्रभारी भी रहे। बसपा में थे तो फर्श से शुरुआत कर अर्श पर रहे। बसपा सरकार में उनका जलवा रहा और वाई कैटेगिरी की सुरक्षा के साथ उनका काफिला चला करता था। लेकिन अचानक हालात बदले और उसके बाद नरेंद्र कश्यप की राजनीति ही बदल गई। वह नीला ‘ब’ छोड़कर भगवा ‘भ’ यानी भाजपा में तो आये पर यह ‘भ’ उन्हें सियासी सकून नहीं दे सका। ‘भ’ का दामन थामने के बाद भी उनका भला नहीं हुआ। ताकत भी दिखा ली और भाजपा के डिप्टी सीएम से लेकर केंद्रीय मत्रिंयों को कश्यप जयंती के बहाने अपना जनाधार भी दिखा दिया और अपने समाज को भी दिखा दिया कि उनका नेता और नेता का जलवा अभी खत्म नहीं हुआ है।
गेम अभी बाकी है। लेकिन एक साल बीतने के बाद अब लगने लगा है कि कहीं गेम फिनिश होने की ओर तो नहीं बढ़ रहा है। भाजपा को उनके कद के हिसाब से जो देना चाहिये था उसके आसार नहीं दिख रहे हैं। मोर्चा प्रकोष्ठों से लेकर क्षेत्रीय कमेटी की घोषणा हो चुकी।
आयोग से लेकर प्रदेश कमेटी की घोषणा हो चुकी। राज्यसभा से लेकर एमएलसी की घोषणा हो चुकी। अब नरेंद्र कश्यप के लिये कौन सी घोषणा बाकी बची है। ओबीसी मोर्चा भी तो घोषित हो चुका। अब जगह ही कहां बची हैं। नरेंद्र कश्यप ने खुद को ओबीसी नेता के रूप में स्थापित करने के लिये अलग से ओबीसी पार्लियामेंट नाम का संगठन बनाकर मैसेज देने की घोषणा भी की।
हिन्दी भवन में इस पहली पार्लियामेंट का सम्मेलन भी किया। लेकिन मैसेज भाजपा के भीतर ही मजबूत नहीं गया। चर्चा रही कि पांच सौ से भी कम सीटों वाला हाल पूरा नहीं भर सका। जो मैसेज जाना चाहिये था नरेंद्र कश्यप वो मैसेज नहीं दे सके। अब सियासत में तो भीड़ का खेल होता है। कल तक बसपा में राष्ट्रीय पद लेकर मंचों पर राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ दिखने वाले नरेंद्र कश्यप आज भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष वाले मंच के फ्रेम से भी आऊट दिखते हैं। भाजपा कार्यक्रमों में कई बार उन्हें मंच पर ही जगह नहीं मिली। अब उन्हीं के लोग कहने लगे हैं कि ‘ब’ वाला ब्ल्यू तो रास आया लेकिन ‘भ’ वाला भगवा और ‘भ’ वाली भाजपा में बात बन नही रही है। आज नरेंद्र कश्यप भाजपा की जमीन पर अपना सियासी वजूद तलाशते दिख रहे हैं। भाजपा बड़ा समुंदर है और यहां सेट होने में समय लगेगा।

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