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मूडीज बोली- रुपये की गिरावट को रोकने के लिए सरकारी प्रयास नाकाफी

नई दिल्ली (ईएमएस)। बाजार को समझने वाली संस्था मूडीज इनवेस्टर्स सर्विस का मानना है कि भारतीय मुद्रा की कमजोरी के लिए सरकारी प्रयास नाकाफी हैं। सरकार ने रुपये में आ रही गिरावट को थामने के लिए कैपिटल इनफ्लो को बढ़ावा देने और आउटफ्लो में कमी लाने का जो पांच सूत्री कार्यक्रम बनाया है, उनसे इंडियन करेंसी की कमजोरी दूर होने की संभावना नहीं है, लेकिन उसने फिस्कल डेफिसिट को टारगेट तक बांधे रखने का जो आश्वासन दिया है, वह क्रेडिट रेटिंग के लिहाज से सरारात्मक है। यह बात मूडीज इनवेस्टर्स सर्विस ने सोमवार को कही।
सरकार के अनुसार, वह जो उपाय कर रही है, उनसे 31 मार्च 2019 को खत्म हो रहे फिस्कल ईयर में कैपिटल इनफ्लो में 8-10 अरब डॉलर यानी जीडीपी के 0.3-0.4 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इन उपायों में विदेश में रुपये में जारी मसाला बॉन्ड के निवेशकों को विदहोल्डिंग टैक्स के दायरे से बाहर रखना और इंडियन बैंकों को उनके लिए मार्केट मेकर बनने की इजाजत देना शामिल है। सरकार ने गैर-जरूरी सामानों के इंपोर्ट पर अंकुश लगाने की मंशा जताई है और मौजूद वित्त वर्ष का फिस्कल डेफिसिट टारगेट हासिल करने की प्रतिबद्धता दोहराई है। मूडीज ने कहा, इन उपायों से सरकार को करेंट एकाउंट डेफिसिट के मोर्चे पर क्रेडिट पॉजिटिव सपोर्ट मिलेगा, लेकिन इनसे रुपये की कमजोरी दूर नहीं होगी। इस साल जनवरी से अब तक रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 13 प्रतिशत गिरकर 21 सितंबर को 72.1 पर आ गया था। हालांकि, मूडीज ने यह भी कहा है कि स्ट्रॉन्ग इकनॉमिक फंडामेंटल रुपये में कमजोरी के चलते बनने वाले क्रेडिट रिस्क को दूर रखेंगे।
मूडीज के अनुसार, ‘सरकार जो उपाय कर रही है, उसका असर कैपिटल इनफ्लो पर दिखने में थोड़ा समय लगेगा। रुपये पर बना दबाव हेजिंग रिक्वायरमेंट खत्म किए जाने से कम हो सकता है लेकिन इससे कंपनियों के लिए फॉरेक्स रेट में उतार-चढ़ाव का खतरा बढ़ जाएगा। गैरजरूरी उत्पादों के आयात पर अंकुश लगाए जाने से इंपोर्ट बिल को काबू में रखने में मदद मिलेगी लेकिन इसका असर तुरंत नहीं होगा। अभी भारत का करेंट एकाउंट डेफिसिट का जो लेवल है, वह 2013 में अमेरिका की तरफ से राहत पैकेज धीरे-धीरे वापस लिए जाने के चलते मुद्रा बाजार में मची हलचल के वक्त के 5फीसदी से बहुत कम है। तब मई से अगस्त के बीच डॉलर के मुकाबले रुपये में लगभग 20फीसदी की गिरावट आई थी। इस साल जून क्वॉर्टर में सीएडी बढ़कर जीडीपी का 2.4फीसदी हो गया। मूडीज के मुताबिक इंडिया का एक्सटर्नल वल्नरेबिलिटी इंडिकेटर 65फीसदी है जो दूसरे इमर्जिंग मार्केट्स से कम है। यह रेशियो बताता है कि किसी देश के फॉरेक्स रिजर्व के मुकाबले अगले एक साल में उसकी विदेशी मुद्रा में कितनी देनदारी है। इंडिया का फॉरेक्स रिजर्व भले ही मार्च 2018 के पीक से 5.7फीसदी नीचे 376.6 अरब डॉलर पर आ गया है लेकिन यह अब भी 2013 के 250 अरब डॉलर से काफी ज्यादा है।

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