न्यायविद बोले, सीजेआई पर यौन उत्पीड़न केस में आंतरिक जांच में नहीं हुआ कानून का उल्लंघन

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नई दिल्ली (ईएमएस)। देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस रंजन गोगोई के विरुद्ध यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली पूर्व महिला कर्मी के आंतरिक जांच कमेटी की रिपोर्ट मांगने को न्यायविदों ने अनुचित करार दिया है। उन्होंने यह भी कहा है कि यह जांच एक प्रश्न को लेकर जांच थी न कि न्यायिक जांच, जिसमें वकील को ले जाने की अनुमति भी नहीं होती। केरल हाईकोर्ट के पूर्व जज तथा सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता वी गिरी के अनुसार इस मामले में जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता में तीन जजों के जांच पैनल (दो महिला और एक पुरुष जज) ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले (इंदिरा जयसिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, 2003) के अनुसार कार्यवाही की है। वकील को पेश न होने देना तथा जांच रिपोर्ट को प्रकाशित न करने में कोई नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं हुआ है।
उन्होंने कहा कि इस मामले में इन सिद्धांतों के उल्लंघन का सवाल नहीं उठता क्योंकि यह न्यायिक जांच नहीं थी। वहीं जांच रिपोर्ट सीजेआई को देने का मतलब यह नहीं है कि वह उसे सार्वजनिक कर दें। यह रिपोर्ट उन्हें सूचना के लिए दी जाती है। गिरी ने कहा कि इन हाउस जांच की प्रक्रिया के बारे में सूचना 1999 के पूर्ण कोर्ट बैठक के प्रस्ताव में है। यह प्रक्रिया सर्वोच्च अदालत की वेबसाइट पर उपलब्ध है। इसमें हाईकोर्ट जज, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के जजों के बारे में जांच प्रक्रिया बताई गई है। इसमें कहा गया है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के जज के खिलाफ कोई शिकायत प्राप्त होगी तो उसे इन हाउस कमेटी उसी तरह से जांच करेगी जैसे हाईकोर्ट के जज के खिलाफ शिकायत मिलने पर की जाती है।
जस्टिस गांगुली दोषी पाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एके गांगुली के केस में इन हाउस कमेटी (तत्कालीन जस्टिस आरएम लोढ़ा) ने तथ्यावेषण किया था और 6 दिसंबर 2013 में जस्टिस गांगुली को दोषी पाया था। लेकिन लड़की ने शिकायत से इनकार कर दिया था। जस्टिस गिरी ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के बारे में कोई अलग से प्रक्रिया नहीं दी गई है। मुख्य न्यायाधीश भी सुप्रीम कोर्ट के जज ही होते हैं, इसलिए यह प्रक्रिया उन पर समान रूप से लागू होगी। इसलिए इसमें वकील को ले जाने की अनुमति नहीं होगी।