जानलेबा साबित होती कुप्रथाओं से निजाद पाने की आवश्यकता

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हिंदुस्तान में आजादी की जंग के साथ ही साथ हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने समाज में व्याप्त बाल विवाह, पर्दा प्रथा और सती प्रथा जैसी अनेक कुरीतियों के खिलाफ अलख जगाने का भी काम किया। यही वजह है कि आज का भारतीय समाज इन कुप्रथाओं के दंश से अपने आपको महफूज महसूस करता हुआ नजर आता है। आखिर कैसे भुलाया जा सकता है कि सदियों इन बुराइयों के कारण महिलाओं और बच्चों व बच्चियों को नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ता रहा है। उनके दु:ख-दर्द को समझने वालों ने जब आवाज उठाई तो उनके खिलाफ भी खड़े होने वालों की कमी नहीं रही, लेकिन थक-हार के बैठ रहने वाले लोग ये नहीं थे। इस कारण समाज में बदलाव आया और आज हम स्वस्थ समाज में श्वांस ले पा रहे हैं। बाल विवाह, सती-प्रथा, पर्दा-प्रथा, जातिवाद के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए ही आज तक राजा राममोहन राय को याद किया जाता है। राजा राममोहन राय जो कि 1772 में जन्में और 1833 को हमेशा-हमेशा के लिए इस फानी दुनिया को अलविदा कह गए। इस प्रकार कहने को तो 18वीं सदी में उन्होंने कुप्रथाओं के खिलाफ आवाज बुलंद की, लेकिन उसकी गूंज आज तक सुनाई दे रही है, क्योंकि समय-समय पर कहीं न कहीं से कुप्रथा पालन के समाचार भी प्राप्त हो ही जाते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारतीय इतिहास में सामाजिक बुराई का इतिहास भी काफी पुराना है, जिस कारण इसकी जड़ें बहुत मजबूत रही हैं। संतोष की बात यह है कि इससे हमारे समाज ने बहुत हद तक पार पा लिया है और दूसरी बुराईयों से निजाद पाने के लिए अथक प्रयासों की अभी भी आवश्यकता है। बहरहाल यहां बात हम महिलाओं की माहवारी से जुड़ी नेपाल की कुप्रथा की कर रहे हैं, जिसके चलते एक महिला को अपनी जान से हाथ धोना पड़ गया। दरअसल नेपाल में चौपाड़ी नामक एक प्रथा है, जिसमें महिलाओं को माहवारी या बच्चा होने के बाद परिवार और घर से अलग एक झोपड़ी में रखा जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि इस दौरान महिला को अशुद्ध या अशुभ मानने और उसी के तहत उसके साथ बुरा बर्ताव करने की प्रथा है। नेपाल की बात क्या करें भारत में ही मासिक धर्म के समय या बच्चे के जन्म के समय महिलाओं को अशुद्ध मानने और चौका व पूजा-पाठ से दूर रखने की प्रथा का पालन आज तक होते हुए देखा जा सकता है। जहां तक नेपाल की बात है तो यहां पीरियड्स के दौरान महिलाओं को जानवरों के लिए बने बाड़े में रहने के लिए भी मजबूर करने की खबरें आती रही हैं, ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि महिला की परछाईं भी किसी मनुष्य, भोजन पदार्थ या ईश्वर की मूर्ति या उसके अन्य रुप पर न पड़ने पाए। इस तरह की कुप्रथाओं को रोकने के लिए भारत ही नहीं बल्कि नेपाल में भी कानूनी व्यवस्था है, लेकिन गाहे-बगाहे इनका पालन भी करने वाले जोर-आजमाइश करते दिख जाते हैं। जहां तक नेपाल की बात है तो यहां शिक्षा और समाजसुधार की महती आवश्यकता है। क्योंकि इस तरह का यह पहला मामला नहीं है, जबकि अछूत मानकर झोपड़ी में रखी गई महिला की दम घुटने से मौत हो गई हो, बल्कि इससे पहले भी यहां औरतों के इसी प्रथा के कारण दम तोड़ने के उदाहरण मिलते रहे हैं। कहना गलत नहीं होगा कि माहवारी महिलाओं को सिर्फ दर्द देने का काम करती है, जबकि रुढ़िवादी परंपराएं तो उनकी जान ले रही हैं, जिससे उन्हें निजाद मिलना ही चाहिए। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि वर्ष 2005 में चौपाड़ी को नेपाल में गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया था, लेकिन अनेक हिस्से ऐसे हैं जहां कि आज भी इस कुप्रथा का पालन धर्म-कर्म मानकर किया जा रहा है। करीब तीन सप्ताह पहले बाजुरा जिले में इसी परंपरा के निर्वहन के कारण एक महिला और उसके दो बेटों की मौत हो गई थी। इन सभी की मौत भी धुएं के कारण घुटन से होना बताई गई थी। बताया जाता है कि इस दु:खद घटना के बाद कुछ स्थानीय लोगों ने अपने गांव से चौपाड़ी झोपड़ियों को हटाने का काम भी कर दिया था। यहां स्थानीय अधिकारियों ने चेतावनी जारी करते हुए कहा था कि यदि कोई अपनी बेटियों-बहुओं को इस परंपरा का पालन करने के लिए मजबूर करता है तो उसे किसी भी तरह की सरकारी सेवा नहीं दी जाएगी। यहां साल 2018 में काठमांडू ने चौपाड़ी प्रथा के पालन करने पर तीन माह की जेल और तीन हजार नेपाली रुपए का जुर्माना लगाने का प्रस्ताव भी पेश किया था। इस प्रस्ताव को बनाने वाले सांसद गंगा चौधरी का मानना है कि कुप्रथाओं के खिलाफ कानून लागू करने और सामाजिक बदलाव लाने की दिशा में बहुत काम होना शेष है। यहां समझने वाली बात यह है कि कड़े कानूनी प्रावधानों और सख्त सजा मात्र से रुढ़िवादी परंपराओं का अंत होने वाला नहीं है। इसके लिए तो जरुरी है कि महिलाओं समेत संपूर्ण समाज को शिक्षित किया जाए और उनमें जागरुकता लाई जाए, तभी बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। विचार करने वाली बात यह है कि सामाजिक परंपराएं और प्रथाएं ऐसी होनी चाहिए, जिससे मानव समाज का भला होता हो, व्यक्ति लाभांवित होते हों। ऐसा न हो कि कुप्रथाओं और रुढ़िवादी परंपराओं का निर्वाहन करते-करते ईश्वर की अनमोल कृतियां समयपूर्व ही इस दुनिया से सदा-सदा के लिए जाने को बाध्य हो जाएं। कुल मिलाकर प्रथाएं और परंपराएं तो ऐसी होनी चाहिए, जिससे इंसान की जिंदगी जीना आसान होती हो, न की जीना दूभर करती हों।
लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान