मुद्दा: तलाक, तलाक, तलाक

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महिलाओं पर बढ़ रहे अत्याचारों को लेकर पूरे देश में एक राय बन रही है कि इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है। देश की आधी आबादी कही जाने वाली महिलाओं के अधिकारों को लेकर केंद्र सरकार ने न्यायलयों को एक राय क्या दी पूरे देश में मानो तूफान आ गया। बात मुस्लिम महिलाओं के हकों को लेकर उठाई गई थी। केंद्र सरकार ने इसमें अपनी तरफ से कोई अध्यादेश लाने की बात नहीं कही। लेकिन मुस्लिम संगठनों ने इस मामले को लेकर जिस तरह से आक्रमक विचारधारा का रुख अपनाया उसे लेकर न चाहते हुए भी हिन्दूवादी दलों को एक मौका मिल ही गया। खास बात यह है कि मुद्दा तीन तलाक की वैधानिकता को लेकर है और इसे पूरी तरह धर्म से जोड़ दिया गया। धर्म गुरुओं ने तो इस पर हस्ताक्षर अभियान भी चला दिया। सवाल इस बात का है कि देश का संविधान और संसद नियम और कानूनों से चलेगी या देश भर से आये हस्ताक्षरों से चलेगी। राय शुमारी का मुद्दा तो कितनी बार कश्मीर को लेकर उठ चुका है। मामला मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को लेकर है और इस मुद्दे पर बसपा के मुस्लिम नेता भी बोलने से बच रहे हैं। नसीमुद्दीन सिद्दीकी से जब इस बारे में खबरनवीसों ने पूछा तो वो जमकर सपा और भाजपा पर तो बरसे लेकिन इस मुद्दे पर चुप्पी साध गये। देश में अगर किसी ने एक कानून की बात कर दी तो कौन सा गुनाह हो जायेगा। परिवर्तन के लिए कठौर कदम उठाने भी पड़ते हैं। इन मुद्दोें को धर्म और राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। दिल्ली में महिलाओं पर अत्याचार बढ़े हैं। इनमें अधिकांश महिलाएं मुस्लिम नहीं हिन्दू धर्म से हैं। देश को हिला देने वाले निर्भय कांड की पीड़िता एक हिन्दू युवती थी। हाल ही में दिल्ली में दिन दहाड़े एक पागल प्रेमी का शिकार बनी युवती भी हिन्दू थी। महिला उत्पीड़न को लेकर सरकारें गंभीर हैं। खुद उत्तर प्रदेश में महिलाओं पर हुए अत्याचारों को सरकार ने गंभीरता से लिया है। मामला बुलंदशहर का हो या एसिड पीड़िताओं का। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इन मामलों में संवेदनशीलता दिखाते हुए त्वरित कार्यवाही की है। देश की अखंडता और मानवता से बड़ा मजहब नहीं हो सकता। अगर किसी समाज में महिलाओं की स्थिति सदियों से खराब है तो इसका यह मतलब नहीं कि कभी इस स्थिति को सुधारने का प्रयास ही नहीं किया जायेगा। आज सरकार ने केवल राय दी है और उस पर बवाल हो रहा है। सरकार का काम ही किसी भी स्थिति को सुधार करने का है। महंगाई पर काबू पाना सरकार का काम है तो बाल श्रम और महिलाओं की स्थिति में सुधार करने का काम भी सरकार का ही है। अब धीरे-धीरे जब इस दिशा में काम हो रहा है तो कई चीजें सामने आ रही हैं। अब से पहले किसी को पता ही नहीं था कि जेएनयू में उच्च शिक्षा के साथ-साथ एक ऐसी विचारधारा पनप रही है जो देश के प्रति एक अलग ही नजरिया रखती है। मामला मुस्लिम महिलाओं का नहीं है, मामला देश भर की महिलाओं का है। धार्मिक मान्यताओं की आड़ लेकर इस सत्य को तर्कों से दबाया नहीं जा सकता। सवाल यह है कि देश बड़ा है या तीन तलाक का मुद्दा। सरकारों को कठोर होकर देश व्यापी बहस करानी ही होगी।
-धन्यवाद