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तेजी से बढ़ रहा है भारत का आर्थिक संकट

नई दिल्ली (ईएमएस)। भारत में अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती ही जा रही है। इसके साथ ही 2008-09 की तुलना में 2017-18 में भारत का आर्थिक संकट बढ़ रहा है। यह चिंता की सबसे बड़ी बात है।
रिजर्व बैंक ने 20 अक्टूबर को रेपो रेट 1 फ़ीसदी घटा दिया है, ऐसा पहली बार हुआ है। अप्रैल 2009 तक 6 बार रेपो रेट कम किया गया था। रेपो रेट 9 से घटकर 4.75 पर आ गया था। इसी दौरान बैंकों का सीएसआर भी 9 फ़ीसदी से घटकर 5 फ़ीसदी पर आ गया था।
आर्थिक संकट के मुख्य बिंदु
सरकार पर 2008 में जीडीपी का 74.5 फ़ीसदी कर्ज था, जो 2017 में जीडीपी के अनुसार 68.7 फ़ीसदी पर आ गया। इस मान से भारत सरकार अपने खर्च को बढ़ाने के लिए अभी कुछ राशि और बाहर निकाल सकती हैं।
2008-09 में राजकोषीय घाटा 6.07 फ़ीसदी था, जो लगभग 3.3 लाख करोड़ रुपए होता था। 2018-19 में यह बढ़कर 6.24 लाख करोड़ होने का अनुमान है। यह राजकोषीय घाटा भी लगभग 3.3 फ़ीसदी होगा।
2008-09 में चालू राजस्व घाटा जीडीपी का लगभग 2.4 फ़ीसदी था। इस साल महंगे कच्चे तेल के कारण यह 2.8 फ़ीसदी पर रहने का अनुमान है। चालू खाते का घाटा वर्तमान समय में सबसे ज्यादा तकलीफ देह होगा। इससे रुपया कमजोर होगा और देश में महंगाई भी बढ़ेगी।
बैंकों का एनपीए भी बड़ी तेजी के साथ बढ़ रहा है। 2008-09 में बैंकों का सकल एनपीए 2.25 फ़ीसदी था। रिजर्व बैंक का अनुमान है कि मार्च 2019 तक यह 12 फ़ीसदी पर पहुंच सकता है, जिसके कारण भारतीय सरकारी बैंक कर्जा देने की स्थिति में नहीं रहेंगे और उन्हें नगदी की कमी का सामना करना पड़ेगा। यह स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए काफी घातक है।

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