समलैंगिक विवाह: मुंबई में पहली गे विवाह पार्टी का मना जश्न

0
421

मुंबई । विवाह समारोह की पार्टियां तो आपने देखी होगी पर मुंबई में एक ऐसी शादी के समारोह को देखने के लिए हर आदमी उत्सुक था। जी हां इस शादी की खास बात थी की इसमें दुल्हा-दुल्हन दोनों ही पुरुष थे। दरअसल, लगभग पांच महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 के तहत समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी के बाहर कर दिया था। इस फैसले के बाद मुंबई में पहली गे मैरेज पार्टी आयोजित हुई है। यह शादी रेनबो वॉइस मुंबई के फाउंडर विनोद फिलिप (43) और फ्रांस के उनके दोस्त विन्सेंट (47) की थी। दोनों ने विवाह के बाद मुंबई के एक होटेल में रिसेप्शन पार्टी आयोजित की थी। दोनों की शादी के इस रिसेप्शन में न केवल उनके मेहमान और परिवार वाले शामिल हुए बल्कि होटलवाले भी उनकी इस खुशी का हिस्सा बने। दोनों ने किसी आशंका के डर से होटलवालों को आखिरी मिनट तक अंधेरे में रखा था कि यह एक ही सेक्स वालों की शादी की पार्टी है। हालांकि जब होटेल मैनेजमेंट को इसकी जानकारी हुई तो उन्हें भी खुशी हुई। उन लोगों ने इस जोड़े के साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया और इस शादी को यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दादर की एक बेकरी में भी जब इस कपल ने संपर्क किया तो उन्होंने भी उनके साथ कोई पूर्वाग्रह नहीं दिखाया। बेकरी की मालिक नेहा बंदिवाडेकर ने इसे उत्सव का हिस्सा बनने को सम्मान के रूप में देखा। उन्होंने कहा, शादी का समारोह प्रेम का उत्सव है। हम इसे सेक्स से जोड़कर नहीं देख सकते। मुझे उम्मीद है कि भविष्य में भी इसी तरह दूसरी समलैंगिक शादियों के कपल की हेल्प कर सकूंगी।
इस जोड़े ने पिछले साल दिसंबर में फ्रांस में शादी की लेकिन फिलिप का मुंबई से अटूट लगाव है। 2014 में उन्होंने चेन्नई से यहां आकर एलजीबीटी समुदाय के लिए काम करने की शुरुआत की और उन्हें यहां से नई पहचान मिली। मुंबई शहर से इसी लगाव के कारण उन्होंने यहां पर शादी का समारोह रखा। पेरिस में रहने वाले फिलिप ने कहा, मैं मुंबई में रहता था, और यहां की एनजीओ हमसफर ट्रस्ट (जो कि एलजीबीटी अधिकारों को बढ़ावा देता है) ने उन्हें हमेशा प्रोत्साहित किया। इस एनजीओ के माध्यम से मैं आखिरकार चेन्नई में अपने परिवार और दोस्तों से बाहर निकलकर आया। फिलिप ने बताया कि वह एक बहुत ही रुढ़िवादी ईसाई परिवार के थे। पहले उनके फैसले से सब सदमे और आश्चर्य में थे लेकिन उनके माता-पिता की अंतिम स्वीकृति ने उनके सभी पूर्वाग्रह को खत्म कर दिया। उनके परिवार ने धार्मिक मूल्यों की परवाह न करते हुए उनके बारे में सोचा।