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ब्याह-शादी के बीच जीडीए डंडा लेकर खड़ा हुआ

गाजियाबाद (करंट क्राइम)। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने गत दिनों मुरादनगर और मोदीनगर में बारात घरों को सील किया है।ये कार्यवाही अधिकतर मामलों में बिना किसी नोटिस के और बिना किसी सुनवाई के की गई है। इस कार्यवाही को लेकर लोगों में चिन्ता है खासतौर से उन लोगों में जिनके परिवारों में ब्याह- शादी और उत्सव हैं, वे कैसे करेंगे? पहले गांव के लोग अपने घरों में ही कार्यक्रम करते थे लेकिन अब सभी के घर- घेर इतने छोटे हो गए हैं कि उनमें कोई कार्यक्रम कर पाना सम्भव नहीं है।
इसी जरूरत में से ग्रामीण क्षेत्रों में और विशेषतौर से नगरीय क्षेत्रों के पास जहां आने जाने के रास्ते उपलब्ध हैं, इन बारात घरों का निर्माण हुआ है।ये क्षेत्र की एक आवश्यक आवश्यकता में से जन्में हैं। जीडीए ने इनको सील करने से पहले लोगों की इस गम्भीर समस्या की ओर क्यों ध्यान नहीं दिया ये समझ नहीं आया।
अगर जीडीए इस कार्यवाही से पहले ऐसे सामुदायिक केंद्रों का निर्माण करा देता जिनमें आम लोग अपने ब्याह शादी सम्पन्न करा पाते तो लगता कि प्राधिकरण के अधिकारी संवेदनशील और जागरूक हैं। या कुछ ऐसी व्यवस्था बनाते जिसमें कमसे कम औपचारिकताओं में इनको नियमित किया जा सके।अपने देश के यशस्वी प्रधानमंत्री कहते हैं कि मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिमम गवर्नेन्स लेकिन यहां के अधिकारी लोगों के ब्याह शादी के बीच में भी डण्डा लेकर खड़े हो गए हैं।
जिन क्षेत्रों में सीलिंग की कार्यवाही हुई है, उन क्षेत्रों के विकास के लिए , उन क्षेत्रों में जन सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए जीडीए ने कभी कोई कार्य तो किया नहीं है। जीडीए ने इन क्षेत्रों में बढ़ती आबादी की आवश्यकता के लिए कभी कोई कार्य योजना बनाई है ? मुझे नहीं लगता कि जीडीए ने उन क्षेत्रों का कोई मास्टरप्लान / सेक्टर प्लान भी बनाया हो या जीडीए इन क्षेत्रों में मानचित्र प्रस्तुत करने पर उन्हें स्वीकृत करने की स्थिति में हो ? फिर सीलिंग की कार्यवाही का क्या औचित्य है? हां ये क्षेत्र जीडीए के कर्मचारियों- अधिकारियों के लिए चारागाह जरूर बन गए हैं, कभी अनधिकृत प्लाटिंग के नाम पर , कभी अनधिकृत
निर्माण के नाम पर और कभी फार्म हाउस के निर्माण के नाम पर कुछ कर्मचारी /अधिकारी मोटी वसूली करते रहे हैं।
जीडीए के कथित जागरूकता के बाद भी गत दिनों मुरादनगर और मोदीनगर के आसपास जितना अनधिकृत कालोनियों का निर्माण हुआ है, इतना निर्माण अन्य क्षेत्रों में नहीं हुआ है।क्या घूस लेकर अनधिकृत निर्माण कराने के दोषियों के विरुद्ध कोई कार्यवाही होगी? एक दो अधिकारी तो ऐसे भी हैं जो निर्माण कराने के पैसे लेकर आये थे और अब वे ही सीलिंग की कार्यवाही करा रहे हैं। आम लोगों से जुड़े इन सवालों पर जनप्रतिनिधि क्यों मौन हैं? अफसर तो आते जाते रहते हैं जनता स्थाई है, उनके दुख-सुख में खड़े रहना , उनकी समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष करना जनप्रतिनिधि का दायित्व है।कानून जनता के लिए है, कानून के लिए जनता नहीं है।
अगर कोई कानून जनता के हितों के विपरीत है तो उसे बदला जाना चाहिए।मैं पहले भी कहता रहा हूँ, ये शहर हमारा है, ये क्षेत्र हमारा है, यहीं पैदा हुए और जब मरेंगे तो यहीं के चार लोगों के कंधों पर जाएंगे इसलिए ये कैसा हो हमसे बेहतर कोई नहीं जानता। वैसे भी जनता की भागीदारी के बिना किसी सरकारी योजना की सफलता संदिग्ध होती और जन भागीदारी के लिए योजना के निर्माण के समय लोगों के हितों को ध्यान में रखना और उन पर विचार जानना आवश्यक है। कुछ अधिकारी जिस तरह से काम कर रहे हैं उन्हें देखकर तो कभी कभी लगता है कि ये सरकार विरोधी हैं क्या ? ये जानपूछकर ऐसे कार्य कर रहे हैं जिससे जनता में सरकार की छवि खराब हो।सरकार को ऐसे अधिकारियों पर लगाम लगानी चाहिए।
बताया जा रहा है कि ये कार्यवाही एनजीटी के निर्देश पर की जा रही है। एनजीटी ने केवल उन बारात घरों को सील करने के लिए कहा है जो ग्रीन बेल्ट में बने हैं। जो कृषि भूमि में बने हैं उन्हें सील करने का कोई औचित्य नहीं है। इस लिए इन तमाम बारात घरों की सील हटाई जाय ताकि लोग अपने निर्धारित कार्यक्रम सम्पन्न करा सकें।

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