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चार हजार कीमत और कोर्ट के चक्कर काटकर हो गया बुरा हाल

जनप्रतिनिधि जी के प्रभारी के फोन चोरी की घटना है बड़ी कमाल
वरिष्ठ संवाददाता (करंट क्राइम)

गाजियाबाद। कहते हैं कि सरकार में नेताओं का जलवा अलग होता है। ये वो दौर होता है जब सरकार वाले जनप्रतिनिधियों के साथ रहने वाले लोग भी पॉवर वाली फीलिंग लेते हैं। कहावत ये भी है कि यदि चलती में ना चलाई तो फिर क्या फायदा। अब नुकसान होने पर यदि पुलिस को सूचना दी जाये और मामला कोर्ट में आ जाये तो फिर फायदे की जगह नुकसान कैसे होता है इसे जनप्रतिनिधि के प्रभारी से बेहतर कौन बता सकता है। पिछले साल मई महीने में जनप्रतिनिधि के प्रभारी का मोबाईल फोन चोरी हो गया। अब पॉवर वालों का फोन चोरी हुआ था तो उम्मीद थी कि एक्शन का शावर आयेगा और मोबाईल चोरी करने वाला पकड़ा जायेगा। लेकिन यहां तो तहरीर भी प्रभारी ने लिखी और सीसीटीवी कैमरों की मदद से मोबाईल चोर के घर का पता भी प्रभारी ने लगाया। इसके बाद जैसे तैसे करके चांद मौहम्मद पकड़ में आया और मोबाईल फोन बरामद हो गया। मगर कहानी इतनी आसान नही थी जितनी प्रभारी समझ कर चल रहे थे। और जब मोबाईल फोन की कीमत आंकी गयी तो वह चार हजार रूपये थी। प्रभारी चाहते थे कि उनका मोबाईल फोन विधिवत रूप से उन्हें हैंडओवर किया जाये। अब विधिवत रूप से फोन मिलने में क्या-क्या दिक्कतें आई यह किस्सा अलग से रोचक है।

जब चार हजार के फोन पर लगी 20,000 की जमानत

ये किस्सा सच्चा है और उन लोगों के लिए आई ओपनर है जो समझते हैं कि चोरी गई चीज अगर मिल जाये तो आसानी से उसके मालिक को दे दी जाती है। प्रभारी का मोबाईल फोन मिला तो उसकी सुपुर्दगी के लिए अदालत के चक्कर शुरू हुए। प्रभारी को चार हजार के फोन के लिए एक वकील करना पड़ा। यहां पर वकील की फीस और वकालतनामे से लेकर टिकट और शुकराना ही 2300 रूपये का बैठ गया। चलो इस पर भी फोन मिल जाता तो गनीमत थी। लेकिन पहले तारीख पर तारीख और फिर झटका तब लगा जब प्रभारी को बताया गया कि आदेश तब होंगे जब आप 20,000 रूपये की श्योरिटी बॉण्ड भरेंगे। प्रभारी अपने मित्र की स्कूटी की आरसी लेकर पहुंचे। मित्र भी आ गये और मित्र को झटका तब लगा जब उन्हें पता चला कि यह फोन माल मुकदमा है और जब तक मुकदमे का निस्तारण नहीं हो जाता तब तक वह अपनी स्कूटी नहीं बेच सकते। यदि स्कूटी बेचेंगे तो अदालत को सूचित करेंगे और प्रभारी दूसरे जमानती की व्यवस्था करेंगे।

अब प्रभारी ने जोड़ लिए हाथ और कहा फोन रखें साहब अपने पास

मामला मोबाईल फोन का है और चार हजार के मोबाईल फोन के लिए अदालत ने 20,000 की जमानत रखवाई। वकील ने 2300 रूपये खर्च करा दिए। अदालत आने-जाने में जो पेट्रोल और समय खर्च हुआ वो अलग। लेकिन सबसे अलग जो हुआ वो वास्तव में जानने लायक है। कोतवाली से प्रभारी जब उनका चोरी हुआ फोन वापिस दिया गया तो इसकी बैटरी पूरी तरह से लांग क्वारनटाईन में जा चुकी थी। फोन की स्क्रीन टूटी हुई थी। अब प्रभारी अपने फोन को लेकर फोन रिपेयर करने वाले के पास पहुंचे। उसने बताया कि इसकी बैटरी चैक करनी पड़ेगी और स्क्रीन का खर्चा 1500 रूपये आयेगा। बैटरी को करंट का झटका देना पड़ेगा, उसके बाद भी चालू होने की गारंटी नही है। 4000 के मोबाईल फोन के अदालती और पुलिसया अनुभव के बाद प्रभारी ने अब हाथ जोड़ लिए हैं। वह बता रहे हैं कि वह अदालत में जाकर इस फोन को वापिस माल खाने में जमा कराने की एप्लीकेशन देंगे। क्योकि 2300 रूपये वकील पहले ले चुका है। फोन वाला 1500 रूपये मांग रहा है और अदालत इस फोन के लिए पहले ही 20,000 रूपये की स्कूटी की जमानत रखवा चुकी है। अब वह केवल इतना निवेदन करना चाहते हैं कि अदालत इस माल मुकदमा, मोबाईल फोन को खुद ही रख ले। कम से कम इसके बाद 20,000 रूपये वाली जमानत खत्म होगी और दोस्त अपनी स्कूटी को तो आराम से बेच सकेगा।

जब हुए आदेश और फंस गया 2020 वाला पेंच

कहानी कदम दर कदम रोचक है और आपको रियल घटना से पता चलेगा कि अदालत की सीढ़ियां चढ़ना और उतरना आसान नही है। प्रभारी के साथ ऐसा हुआ जब उन्हें चार बार पूरी दोपहरी इस इंतजार में कोर्ट में बैठना पड़ा कि जज साहब आदेश करेंगे। आखिरकार वो दिन आया और आदेश वाला पर्चा प्रभारी के हाथ में आ गया। प्रभारी जब इस पर्चे को लेकर कोतवाली पहुंचे तो यहां जैसे ही मुंशी की नजर पर्चे पर पड़ी तो उसने साहब को बताया कि फोन 2019 में चोरी हुआ है और आदेश पर 2020 लिखा है। फिर से मामला बैक टू अदालत हुआ। फिर से आदेश आया और तब जाकर प्रभारी के हाथ में उनका मोबाईल फोन आया।

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