लोकतंत्र का ‘चीरहरण’ देखनें को मजबूर देश…..?

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ये माना कि भारत का लोकतंत्र बुजुर्ग हो गया है, लेकिन क्या उसकी सिर्फ बहात्तर साल की उम्र में ऐसे हालात पैदा किए जाए जिससे कि वह आत्महत्या को मजबूर हो जाए? लेकिन आज हो वही रहा है, आज न संविधान की अहमियत रह गई है और न लोकतंत्र की, आज सत्ता और पैसा संविधान व नैतिकता से काफी ऊपर हो गया है, सत्ता कायम रखने या उसे हथियाने के लिए नैतिकता व राष्ट्रीयता के सभी मापदण्ड़ों की बलि दे दी गई है, अब हमारे आधुनिक भाग्यविधाताओं (नेताओं) में न तो वाणी का नियंत्रण रहा है और न ही उनमें कर्म की शर्म शेष रही, समय के ऐसे दौर में देशवासियों के भी सामने अपने सिर घुनने के अलावा विकल्प ही क्या है? क्या देश के इस माहौल को किसी ने भी गंभीरता से पढ़ने की कौशिश की? आज पूरे देश में सत्ता हथियाने की आपाधापी मची हुई है। देश का हर राजनीतिक दल सत्ता में भागीदारी के आज सपने देख रहा है।
देश का सत्ताधारी दल जहां अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए मर्यादाओं की हर सीमा लांघ रहा है, वहीं विपक्षी दल सत्ता की जुगाड़ में एक-दूसरे के साथ होने का नाटक कर रहे है, और जहां तक सत्ता की मुख्य धुरी मतदाता का सवाल है, उसे हमेशा की तरह प्रलोभानों के जाल में फंसाकर अपना ‘उल्लू’ सीधा करने के प्रयास किये जा रहे है और इसी बीच जो मतदाता असहाय, भूखा, गरीब और जरूरतमंद है, वह वैसा ही है और आगे भी वैसा ही रहने वाला है, क्योंकि अब ‘‘जुमलों’’ का वैकल्पिक शब्द खोजने की भी पूरी मशक्कत शुरू हो गई है।
आज हर कोई अपनी दलीलें रख रहा है, बैचारे मतदाता की सुनने और उसके बारे में विचार करने की किसी को भी न तो चिंता है और न ही समय? प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े पर सवार है तो विपक्षी सूरमा उनसे निपटने में व्यस्त है, पूरे देश को राजनीतिक महाभारत का अखाड़ा बनाकर रख दिया है, राज्यों के मुख्यमंत्री जहां अपने राज्यों को अपनी बपौती समझ संविधान को ताक में रख अपनी मनमर्जी और गैर संवैधानिक कृत्य करने में व्यस्त है तो प्रधानमंत्री जी वह सब कर रहे है जो आज तक देश के किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया, उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपनी सत्ता कायम रखने की चिंता है फिर देश की मर्यादा व नैतिकता चाहे कितने ही नीचे गर्त में क्यों न चली जाऐ?
देश की इस स्थिति से यदि कोई चिंतित है तो वह सिर्फ देश का बुद्धिजीवी वर्ग जिसे देश के लोकतंत्र और संविधान की मर्यादा की चिंता है, लेकिन वह भी असमंजस में है, क्योंकि वह जानता है कि अकेला ‘बुद्धिजीवी चना’ सत्ता की लालची ‘भाड़’ को फोड़ नहीं सकता, इसलिए वह छटपटाने और अपनी मर्यादा में रहकर कलम चलाने के अलावा कुछ नहीं कर सकता। फिर वह देश की अस्मिता को बचाने के लिए मद्द मांगे भी तो किससे, फिर उसे यह भी चिंता कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी अब अहमियत नहीं रह गई, क्योंकि ‘शक्तिमान’ अब अपनी सहनशक्ति खो चुके है और बुद्धिजीवी के खिलाफ कोई भी कार्यवाही कर सकते है इसलिए आज का बुद्धिजीवी वर्ग भी अपने आपको असहाय व दुखी महसूस कर रहा है और अब उसके पास भी देश में चल रहें ‘चीरहरण’ के दुःखद दृष्यों को ‘पांडव’ की मुद्रा में देखतें रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है, वह इंतजार कर रहा है उस ‘कृष्ण’ का जो देश की ‘द्रोपदी’ को वस्त्रहीन होने से बचा सके? और द्वापर में तो फिर भी ‘कृष्ण’ आ गए थे, किंतु अब इस ‘चीरहरण’ से देश को कोई ‘कृष्ण’ बचाएगा, उसके तो आसार भी नजर नहीं आ रहें है।
-ओमप्रकाश मेहता