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ग़ाजियाबाद सम्पादकीय

संपादकीय: साल और सफर याद रहेगा

एक मई कलेंडर की वो तारीख है जिसे मजदूर दिवस के रूप में याद किया जाता है। यह तारीख मजदूर दिवस के रूप में जानी जाती है। लेकिन इस वर्ष जो कुछ हुआ है उसे मजदूर कभी नहीं भूल पाएंगे। एक सफर ऐसा कराया है जिसे तारीख में हमेशा दर्ज किया जाएगा। आखिरकार लॉकडाउन में मई की पहली तारीख आई और अपने साथ एक इतिहास समेटे हुए लाई। मजदूर वर्ग की बात करें तो दिल्ली और इससे सटे एनसीआर इलाके में बिहार से लेकर मध्य प्रदेश के मजदूर रहते हैं। पूर्वांचल से एक बड़ा वर्ग रोजी-रोटी कमाने के लिए दिल्ली, गुड़गाव, नोएडा और गाजियाबाद का रुख करता है। देश में 1947 के विभाजन के बाद पहली बार ऐसी तस्वीर देखने को मिली। लोग महज दो थैलों में पूरी बस्ती का सामान डालकर सैकड़ों किमी का सफर करने को तैयार थे। इस बात का गवाह दिल्ली से सटा गाजियाबाद बना। जहां से लाखों मजदूर पैदल हो लिए। आखिर ऐसा क्या था कि सरकार मजदूरों को यह यकीन दिलाने में फेल हो गई कि उनके रोजगार पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा और सरकार उन्हें लॉकडाउन अवधि में रोटी उपलब्ध करा देगी। अब से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ और पहली बार ऐसा हुआ जब देश का मजदूर अपने रोजगार स्थल को छोड़कर पैदल ही 800 से 900 किमी का सफर तय करने निकल पड़ा। मार्च के महीने के अंत में लॉकडाउन हुआ था और अप्रैल का महीना पूरा गुजर गया और अब तक 17 मई तक लॉकडाउन रहना है। सवाल यही है कि जीवन का ये संघर्ष आखिर इस तरह से इस मोड़ पर क्यों आया। गाजियाबाद से एक मजदूर ने अपने दो छोटे बच्चों और पत्नी के साथ पैदल ही गोरखपुर तक का सफर तय कर लिया। ये मजदूर कोई राष्टÑीय खिलाड़ी नहीं थे जो पैदल चाल की किसी प्रतियोगिता में भाग ले रहे थे। इन मजदूरों को किसी ने देश निकाला भी नहीं दिया था, फिर ऐसी क्या वजह रही कि लाखों लोग पैदल ही अपने गांव की ओर चल दिए। ये वर्ष और ये मंजर हिन्दुस्तान के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया है। इतिहास में यह भी दर्ज हुआ है कि 8 साल के बच्चे ने 800 किमी का सफर पैदल तय किया और इतिहास में यह भी दर्ज हुआ कि सरकार को आगे आकर यह कहना पड़ा कि मजदूरों से किराया ना लिया जाए। लेकिन इसके बाद भी सफर जारी रहा और आज जब लॉकडाउन बढ़ चुका है तब यह एक सोचने का विषय है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में देश की राजधानी से और उसके आसपास के क्षेत्रों से मजदूरों ने रातोंरात पलायन किया। वजह कोई युद्ध नहीं था और ऐसा भी नहीं था कि मजदूर रातोंरात पैदल चलकर महामारी से बच सकते थे। मगर आजादी के बाद यह पहला मंजर था जब एक बड़ी आबादी सैकड़ों किमी का पैदल सफर तय करने पर आमादा थी। अब यह वर्ष और यह सफर मजदूरों को हमेशा याद रहेगा। यह तारीख इतिहास में दर्ज होगी, जब मजदूरों का दिवस आया था और मजदूरों के पास कोई रोजगार नहीं था। यह पहला मजदूर दिवस होगा जब मजदूर बिना मजदूरी के बैठे हैं और सरकार के दिए आटे से अपना और अपने बच्चों का पेट भर रहे हैं।

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