पैदल तो दाना मांझी चला था

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ब शव यात्रा में प्रधान चौकीदार 6 किलोमीटर पैदल चले तो इंच इंच भूमि मीडिया के शब्दो में धन्य हो गई। राजा सिहांसन से उतरकर पैदल चल रहा था तो लोकतंत्र मीडिया की नजरो में राजतंत्र का अहसास करा रहा था। 6 किलोमीटर की यात्रा की महानता में 6 लाख शब्द लिखे गये स्पून कलम से। लेकिन देश को याद रहें कि शव यात्रा तो इसी देश में दाना मांझी की पत्नी की निकली थी। जब दाना मांझी अपनी पत्नी के शव को कंधे पर लाद कर 6 किलोमीटर चला था। पैदल तो कोई पिता कानपुर के हैलट अस्पताल में अपने बीमार बेटे को कंधे पर लेकर चला था। सरकार को खबर हो कि आज भी कितने दाना मांझी रोज कंधो पर लाश लेकर चलते है फर्क इतना है कि मीडिया के लिये अब ये ब्रेकिंग नही हैं। आज भी उड़ीसा से लेकर बंगाल तक पता नही कितने दाना मांझी मिल जायेगें। महानगर की झुग्गी बस्ती में जब कोई मरता है तो उनके पास धर्माथ शवयात्रा के वाहन को देने के लिये पैसे नही होते। देखा है कभी किसी झुग्गी में मरे गरीब की शवयात्रा को वाहन से जाते हुये। बस्ती से शमशान दूर है तो कंधे बदल बदल कर जिदंगी का आखिरी सफर पूरा होता है। पैदल ही आते है ये गरीब 6 से भी ज्यादा किलोमीटर चलकर। किलोमीटर ही गिन रहे हो तो राजस्थान के उस गांव में भी जाना जहां रोज ही नारीशक्ति दो घड़े पानी के लिये आठ किलोमीटर पैदल चलती हैं। देहात के गांवो में सरकारी स्कूल में गरीब मां बाप के बच्चे पीठ पर बस्ता लादकर रोज ही पैदल चलते हैं। वैसे पैदल तो वो वर्ग भी चलता है जिसने चिकन और पनीर खाकर वेट गेन कर लिया है और अब वो ट्रेड मिल पर कई किलोमीटर चल रहे हैं। अब गरीब के दर्द को महसूस करना और समझना उनके बस की बात नही है जो मर्सीडीज कार में बैठकर आते हैं और एकंर बनकर स्टूडियो में बैठकर गर्मी में भी ठंड का मजा ले रहे हैं। असाइनमेंट हैड की हर बात में यस करता स्टिंगर भला हिन्दुस्तान की असली झांकी को कैसे देख पायेगा। जिनके कंधो पर देश की असली तस्वीर दिखाने की जिम्मेदारी है वो तो राजा के दरबारी की भूमिका में दिख रहे हैं। सात दिन का राष्ट्रीय शोक था पूरे देश में कलश थे लेकिन शोक अपनी जगह और शौक अपनी जगह इसलिये सात दिन के शोक में ही 6 गर्वनर नियुक्त हो गये। बहरहाल अपनी वाणी इन शब्दो के साथ
कौम के गम में डिनर करते हैं हुक्काम के साथ
रंज लीडर को तो बहुत हैं मगर आराम के साथ