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पीड़ितों के लिए कांग्रेसी नेता बिजेन्द्र यादव की पुलिस से नोकझोंक

वरिष्ठ संवाददाता (करंट क्राइम)

गाजियाबाद। सरकार बदली है तो पुलिस का रवैया भी बदलने लगा है। पहले सपा की सरकार थी तो पुलिस वाले सपा नेताओं से अभद्रता करते थे। अब भाजपा की सरकार आयी है तो उसने तो अपने नेताओं के थाने जाने पर भी पाबंदी लगा रखी है। अगर किसी समस्या को लेकर कांग्रेस के नेता भी थाने जाते हैं तो पुलिस माहौल बनाकर नेताओं को गलत साबित करने का प्रयास करती है।
कुछ ऐसा ही मामला इन्दिरापुरम थाने में तब हुआ जब कांग्रेस के नेता बिजेन्द्र यादव किसानों के बच्चों के साथ हुए मारपीट के मामले में थाने पहुंचे। यहां मौजूद दरोगा और सिपाहियों ने बिजेन्द्र यादव पर ही आरोप लगाए और खुद पुलिस मारपीट के आरोपियों के साथ खड़ी दिखाई दी। कांग्रेस नेता बिजेन्द्र यादव की गिनती उन नेताओं में होती है जो जनमुददों को लेकर सरकार तक के खिलाफ मोर्चा खोल देने की ताकत रखते हैं। राजनीति का एक लम्बा ट्रैक रिकॉर्ड है और साफ छवि के नेताओं में गिनती होती है। बिजेन्द्र यादव और उनके भाई की साहिबाबाद मंडी में आढ़त है। उनके यहां कासगंज से किसान आते हैं। इन दिनों अटल चौक वसुन्धरा में कोई मेला चल रहा है। किसानों के बच्चों ने मेले में लगे स्टॉल पर मजदूरी की थी। जब मजदूरी के पैसे देने का समय आया तो संचालक पैसे देने में आना कानी करने लगे। किसानों और उनके बच्चों ने जब अपने पैसे मांगे तो मेला संचालकों के बाउंसरों ने उनकी पिटाई कर दी। बाउंसरों की पिटाई का शिकार हुए किसानों और उनके बच्चों ने फोन कर बिजेन्द्र यादव से मदद मांगी।
इसी बीच बिजेन्द्र यादव के भतीजे और आढ़त के मुनीम भी मौके पर जब मामला जानने के लिए पहुंचे तो बाउंसरों ने उनके साथ भी मारपीट कर दी। कांग्रेस नेता बिजेन्द्र यादव इंदिरापुरम थाने पहुंचे और पुलिस को मामले से अवगत कराया। इसके बाद वे पुलिस को लेकर मेला स्थल पहुंचे। बताते हैं कि इंदिरापुरम थाने का एक दरोगा और दो सिपाही इस मामले को रफा-दफा करने की कोशिश में थे। जब कोई मौका नहीं मिला तो उन्होंने बिजेन्द्र यादव पर अभद्रता करने का भी आरोप लगा दिया। इस पर कांग्रेस नेता बिजेन्द्र यादव ने कहा कि हम सभ्रांत और सभ्य लोग हैं। यदि हमें लड़ाई ही करनी होती तो हम पुलिस के पास क्यों आते। इसी मामले को लेकर तू तू मैं मैं की नौबत आ गयी। इस पूरी बातचीत का वीडियो भी वायरल हुआ है। अब इस बात को लेकर ही चर्चा शुरू हो गयी है कि क्या थानों में अन्य दलों के नेताओं को किसी पीड़ित की मदद के लिए जाना चाहिए या नहीं। इससे पहले भी कुछ दिन पूर्व एक थानेदार ने एक नेता की बात ही एक केन्द्रीय मंत्री के भाई से करा दी थी। कई ऐसे आए हैं जो चार्ज संभालते ही खुद को मंत्रियों का रिश्तेदार बताते हैं। अब अगर पुलिस का यही रवैया रहेगा तो क्या कोई थाने जाने की हिम्मत जुटा पाएगा। कुछ दिन पहले एक थाने का सिपाही किसी गरीब को फोन पर धमका रहा था। जब उसे कहा गया कि यह मामला महिला थाने का है तो सिपाही ने उल्टा कहा कि क्या चौकी में ताला लगा दें। पुलिस अपराध तो रोक नहीं पा रही है और थाने में लोगों के अपमान पर तुली है। क्या पुलिस आम आदमी की सुरक्षा के लिए है या मेला संचालकों के बाउंसरों को बचाने के लिए योगी सरकार ने उनकी थानों में तैनाती की है।

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