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अरुण गोविल : राम रूप बिसरे नहीं कोई

नई दिल्ली| अभिनेता अरुण गोविल अपने असली नाम से अधिक रामानंद सागर के लोकप्रिय धारावाहिक ‘रामायण’ के राम के रूप में जाने जाते हैं। अरुण के नाम के साथ राम की छवि इस कदर एकरूप हो चुकी है कि उनका नाम आते ही जेहन में उनकी कोई और तस्वीर नहीं उभरती।

राम के रूप में हर घर में पहचान बनाने वाले अरुण ने राम की भूमिका को इतनी सार्थकता के साथ निभाया था कि राम का किरदार ही उनकी दूसरी पहचान बन गई। लोगों को उन्हें राम से इतर कुछ भी मानना कबूल नहीं है, जिसका खामियाजा उन्हें अपने करियर में भी भुगतना पड़ा।

स्कूल में पढ़ाई के दौरान किशोर अरुण ने कई नाटकों में हिस्सा लिया था, लेकिन उन्होंने कभी अभिनय को अपना करियर बनाने के बारे में नहीं सोचा था।

मेरठ में 12 जनवरी, 1958 को जन्मे अरुण गोविल 17 साल की उम्र में अपने व्यवसायी भाई के साथ व्यवसाय में सहयोग के लिए मुंबई चले गए, लेकिन व्यवसाय से जल्द ही उनका रुझान हट गया और उन्होंने अभिनय के क्षेत्र में करियर बनाने का फैसला कर लिया।

हालांकि उन्हें छोटे परदे के राम के रूप में पहचान मिली, लेकिन उन्हें अभिनय का पहला ब्रेक 1977 में ताराचंद बड़जात्या की फिल्म ‘पहेली’ में मिला।

रामानांद सागर के राम बनने से पहले उन्हें सीरियल ‘विक्रम और बेताल’ में राजा विक्रमादित्य का किरदार निभाने का मौका मिला था। बेताल को कंधे पर लादे राजा विक्रमादित्य की भूमिका उन्होंने इतने सशक्त ढंग से निभाई कि इसकी सफलता के बाद उन्हें 1987 में ‘रामायण’ में भगवान राम का किरदार निभाने का मौका दिया गया।

लेकिन अरुण के लिए खुद को पर्दे पर इस किरदार में ढालने के साथ ही एक और चुनौती भी थी। वह जहां भी जाते, लोग उनके पैर छूने लगते, यहां तक कि उनके आगे बुजुर्गो के हाथ भी श्रद्धा में जुड़ जाते।

ऐसे में राम के रूप में श्रद्धेय माने जाने वाले अरुण को बरसों से पड़ी अपनी धूम्रपान की लत भी छोड़नी पड़ी।

इस चरित्र के साथ उनका जिंदगीभर के लिए ऐसा नाता जुड़ गया कि वह इस छवि से अलग ही नहीं हो पाए। नतीजा यह हुआ कि उनका अभिनय का करियर लगभग खत्म हो गया। उन्हें केवल ऐसी ही भूमिकाओं के ही प्रस्ताव मिलने लगे। इस छवि को तोड़ने की कोशिश में उन्होंने कई सालों तक खुद को अभिनय से दूर रखा और केवल प्रोडक्शन का काम ही संभाला।

उन्हें केवल ऐसी ही भूमिकाओं के प्रस्ताव मिलने लगे, मगर करीब 9-10 साल तक उन्होंने अभिनय दूर रहकर सिर्फ प्रोडक्शन का काम संभाला।

‘रामायण’ के लक्ष्मण यानी सह-अभिनेता सुनील लाहिड़ी के साथ मिलकर उन्होंने अपनी एक टीवी कंपनी बनाई, जिसके तहत वह कार्यक्रमों के निर्माण से जुड़े रहे। इस दौरान उन्होंने मुख्य रूप से दूरदर्शन के लिए कार्यक्रम बनाए।

इसी दौरान उन्होंने दूरदर्शन के लिए वरिष्ठ नागरिकों के एक समूह के जीवन पर केंद्रित धारावाहिक ‘हैप्पी होम्स’ और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर आधारित धारावाहिक ‘मशाल’ का भी निर्माण किया।

भले ही रामायण को प्रसारित हुए करीब तीन दशक हो चुके हैं, लेकिन अरुण गोविल आज भी केवल टीवी के राम के रूप में ही पहचाने जाते हैं।

‘रामायण’ और ‘विक्रम बेताल’ के अलावा उन्होंने छोटे पर्दे पर ‘लव कुश’, ‘अंतराल’, ‘बुद्ध’, ‘अपराजिता’, ‘मशाल’, ‘बसेरा’ और ‘कारावास’ जैसे कई धारावाहिकों में काम किया।

इसके अलावा उन्होंने ‘सावन को आने दो’, ‘सांच को आंच नहीं’, ‘हिम्मतवाला’ और ‘श्रद्धांजलि’ जैसी कई बॉलीवुड फिल्मों में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी। हिंदी फिल्मों के अलावा उन्होंने कई भोजपुरी, उड़िया और तेलुगू फिल्मों में भी काम किया।

पर्दे पर राम बनकर सभी के मन में अपने लिए श्रद्धा हासिल करने वाले अरुण गोविल अब अपनी असल जिंदगी में भी मर्यादा के आदर्शो को उतारना चाहते हैं। इसी प्रयास में वह ब्रह्मऋषि श्री कुमार स्वामी के मार्गदर्शन में सामाजिक कार्यो से जुड़े हैं।

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