वायु प्रदूषण बना पूरी दुनिया के लिए जानलेवा, जलवायु समझौता ठुकराने वाला अमेरिका सबसे अधिक जिम्मेदार

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न्यूयार्क (ईएमएस)। वैश्विक हवा में घुलता जहर पूरी दुनिया के लिए जानलेवा सिद्ध हो रहा है। वायु प्रदूषण बड़ी चुनौती बना हुआ है। वायु प्रदूषण न सिर्फ पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित करता है बल्कि इंसानी सेहत को भी नुकसान पहुंचाता है। पैरिस जलवायु समझौते को ठुकराने वाले अमेरिका में वायू प्रदूषण को लेकर चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। दुनिया में सबसे विकासशील देशों में अग्रणी देश अमेरिका कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) उत्सर्जन को नियंत्रित रखने के प्रयासों में असफल माना जा रहा है। रोडियाम समूह के विश्लेषकों का दावा है कि अमेरिका में वर्ष-दर-वर्ष बढ रहा सीओ2 उत्सर्जन में 2018 में 3.4 प्रतिशत तक उछाल आया है जिसे साल 2010 के बाद सबसे बड़ी वृद्धि माना जा रहा है।
शोध दल ने इसके लिए कड़ाके की सर्दी और औद्योगिक विकास को मुख्य कारण बताया है। शोधकर्ताओं के अनुसार कड़ाके की सर्दी के चलते गर्मी के लिए तेल और गैस का उपयोग बढ़ जाता है जो सीओ2 उत्सर्जन में तेजी से वृद्धि करता है। इसके अलावा अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए किए जा रहे औद्योगिक विकास के लिए पर्यावरण नीतियों के खिलाफ कारखानों, विमानों और ट्रकों के अधिक उपयोग से उत्सर्जन में तेजी आती है। अमेरिका में अकेले उद्योगो के कारण ही उत्सर्जन में 5.7 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है।
शोधकर्ताओं के अनुसार अमेरिका में कोयले के उपयोग में तेजी से गिरावट के कारण और बिजली से संबंधित उत्सर्जन में 1.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। शोधकर्ताओं का मानना है कि कि अमेरिका में आर्थिक सफलता को बढ़ाने प्रयास तो किए जा रहे हैं लेकिन औद्योगिक विकास के चलते सीओ2 उत्सर्जन में वृद्धि को रोकने के कोई कारगार कदम नहीं उठाए जा रहे जिस कारण इसमें तेजी से वृद्धि हो रही है।
इसके अलावा यह भी स्पष्ट है कि वर्तमान अमेरिकी नीतियां जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का विरोध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक कार्बन डाईऑक्साइड गैस उत्सर्जन के मामले में 27 फीसदी हिस्सेदारी के साथ चीन पहले, अमेरिका 15 फीसदी के साथ दूसरे, यूरोपीय संघ 10 फीसदी के साथ तीसरे व भारत 7 फीसदी हिस्सेदारी के साथ चौथे स्थान पर है। दुनिया के कुल उत्सर्जन में इन चार देशों की 58 फीसद हिस्सेदारी है। बाकी सभी देश समग्र रूप से 42 फीसदी उत्सर्जन करते हैं। एक अन्य अध्ययन के मुताबिक वर्ष 1990 से वर्ष 2010 के बीच कार्बन डाईआक्साइड गैस का उत्सर्जन सबसे ज्यादा हुआ। इन दो दशकों के दौरान इसके उत्सर्जन में 45 फीसदी की वृद्धि हुई। वर्ष 2010 में कार्बन डाईआक्साइड का उत्सर्जन 33 अरब टन हो गया, जो अब तक का सर्वाधिक स्तर है। इस अवधि के दौरान इसका उत्सर्जन यूरोपीय संघ के देशों में सात प्रतिशत और रूस में 28 प्रतिशत घटा, जबकि अमेरिका में पांच प्रतिशत की वृद्धि हुई। जापान में इसका उत्सर्जन पहले जैसा ही रहा।