Current Crime
बिहार

78 साल पुराने इतिहास को दोहरा रही बिहार की राजनीति

पटना। बिहार में सत्ता संघर्ष की कहानी नई नहीं है। 78 साल पहले श्रीकृष्ण सिंह के समय में भी कुर्सी के लिए ऐसी ही जंग हुई थी। सारे हालात आज ही की तरह थे। तत्कालीन गवर्नर पर पक्षपात के भी आरोप लगे थे और विरोधी गुट की सरकार को बहुमत साबित करने के लिए मौका भी पर्याप्त दिया गया था। बात 1937 की है। तब देश आजाद भी नहीं हुआ था, लेकिन गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट (1935) के तहत बिहार में लोकतंत्र बहाल करने का पहला प्रयास था।
आजादी के बाद 29 अप्रैल 1952 को बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में श्रीकृष्ण सिंह ने सत्ता संभाली थी और 31 जनवरी 1961 तक आजीवन इस पद पर बने रहे। इसके पहले 20 जुलाई 1937 को बिहार के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। उस समय की संवैधानिक व्यवस्था में मुख्यमंत्री को ही प्रधानमंत्री कहते थे। इस कुर्सी के लिए तत्कालीन गवर्नर मौरिस हैलेट ने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए मो. युनूस को नियुक्त कर दिया था।
गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के तहत जनवरी 1937 में बिहार विधानसभा के लिए चुनाव कराए गए थे। इसमें कुल 152 में से 98 सीटों पर कांग्र्रेस को जीत मिली थी। श्रीबाबू मुंगेर से जीतने के बाद केंद्रीय असेंबली से इस्तीफा दे दिया था और प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। विधायक दल के नेता पद के लिए अनुग्र्रह नारायण सिंह ने उनका नाम प्रस्तावित किया था, जो सर्व सम्मति से पास भी हो गया था। सरकार बनाने के लिए आमंत्रण मिलने पर श्रीकृष्ण सिंह ने लिखित आश्वासन मांगा कि सामान्य हालात में गवर्नर न तो विशेषाधिकार का इस्तेमाल करेंगे और न ही सरकार के मामलों में हस्तक्षेप करेंगे। गर्वनर जब राजी नहीं हुए तो श्रीबाबू ने सरकार बनाने से ही इन्कार कर दिया। प्रतिक्रिया में गवर्नर ने संवैधानिक नियमों के विपरीत मुस्लिम इंडिपेंडेंट पार्टी के नेता मो. युनूस को 1 अप्रैल 1937 को बिहार के प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी। इस पद पर 19 जुलाई 1937 तक बने रहे।
गवर्नर के इस फैसले से पूरा बिहार आंदोलित हो गया। स्कूल, कालेज बंद हो गए। लोग सड़कों पर उतर आए। सीमांत गांधी अब्दुल गफ्फार खां जैसे नेताओं ने भी इसे असंवैधानिक करार दिया था।
युनूस की सरकार बनवाने के पीछे अंग्र्रेज गवर्नर का मकसद यह था कि सत्ता में आने के बाद युनूस अपने लिए पर्याप्त बहुमत का जुगाड़ कर लेंगे, मगर ऐसा हो नहीं सका। कांग्र्रेस के किसी विधायक ने पाला नहीं बदला। भारी दबाव के बावजूद गवर्नर ने सदन का अधिवेशन नहीं बुलाया। जिसके चलते मो. युनूस 19 जुलाई 1937 तक पद पर बने रहे।
आखिर में महात्मा गांधी के हस्तक्षेप पर देश के तत्कालीन वायसराय लिनलिथगो ने गवर्नर को श्रीकृष्ण सिंह की शर्तों को मानने के लिए बाध्य किया। इसके बाद ही कांग्र्रेस ने सरकार बनाना स्वीकार किया। इस तरह 20 जुलाई 1937 को कांग्र्रेस की पहली सरकार ने बिहार में पदभार ग्र्रहण किया। श्रीकृष्ण सिंह प्रधानमंत्री बने। अनुग्रह नारायण सिंह, जगलाल चौधरी और डा. सैयद मो. मंत्री नियुक्त हुए। रामदयालु सिंह विधानसभा के अध्यक्ष बने तथा अब्दुल बारी को उपाध्यक्ष बनाया गया। इस सरकार ने सदन में भी अपना बहुमत सिद्ध किया।

Related posts

Current Crime
Ghaziabad No.1 Hindi News Portal
%d bloggers like this: