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आतंकवाद की तुलना में सड़क हादसों में 4 गुना अधिक मौतें

भारत में सड़क दुर्घटना से मौतों की संख्या आतंकवाद के कारण होने वाली मौतों से चार गुना अधिक है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की रपट के मुताबिक, दो वर्षो में सड़क दुर्घटना से होने वाली मौतों में कमी आने के बाद 2014 में इनकी संख्या में फिर से बढ़ोतरी हुई है। (road accidents news) इनमें से अधिकांश मौतें वाहन चालक की गलती के कारण हुईं।

एक अनुमान के मुताबिक, सड़कों पर होने वाली मौतों में से अधिकांश ऐसे कारणों से होती हैं जिन्हें रोका जा सकता है जैसे कि वाहन की तेज रफ्तार, शराब पीकर वाहन चलाना और वाहन पर आवश्यकता से ज्यादा सवारियां या माल होना।

पांच कारणों पर लगाम लगाकर सड़क हादसों से होने वाली मौतों को कम किया जा सकता है।

-भारतीय सड़कों पर होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण तेज गति है। 2014 में इसके कारण 41 फीसदी मौतें हुई थीं। इससे पूर्व के वर्षो में भी तेज गति के कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा लगभग इतना ही था। इस कारक को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। वाहनों की गति में थोड़ी कमी लाकर काफी हद तक सड़क हादसों को रोका जा सकता है।

सड़क सुरक्षा के लिए समर्पित अमेरिका के एक संगठन ए.ए.ए. फाउंडेशन द्वारा प्रायोजित एक अध्ययन के अनुसार, 37 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही कार से टकराने पर एक राहगीर की मौत का अनुमानित खतरा 10 फीसदी है, लेकिन यही खतरा वाहन की तेज गति के साथ काफी बढ़ जाता है और तेज रफ्तार पर यह 90 फीसदी हो जाता है। खासतौर पर राजमार्गो पर गति शहर की तुलना में काफी अधिक होती है। राजमार्गो पर गति सीमा पर सख्ती लागू करके हजारों जानें बचाई जा सकती हैं।

– भारतीय राजमार्गो पर सामान्य से ज्यादा भरे और तेज रफ्तार ट्रक बेहद आम हैं। जरूरत से ज्यादा भरे ये ट्रक प्रतिदिन 100 जिंदगियां लील लेते हैं। 2014 में इन दो कारणों से 36,543 मौतें हुईं। दोनों कारण ऐसे हैं जिन पर अकुंश लगाया जा सकता है।

-नशे में वाहन चलाना भी सड़क हादसों का एक बड़ा कारण है। मध्य प्रदेश और बिहार में होने वाली मौतों में से एक चौथाई शराब पीकर गाड़ी चलाने के कारण होती हैं। मुंबई और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में पुलिस शराब पीकर वाहन चलाने वालों के खिलाफ लगातार अभियान चलाती है।

– भारतीय सड़कों पर सबसे अधिक चलने वाले दोपहिया वाहनों के कारण भी काफी मौतें होती हैं। 2014 में सड़क हादसों में मरने वालों में 30 फीसदी लोग दोपहिया वाहन सवार थे, जबकि तीन फीसदी साइकिल सवार और नौ फीसदी राहगीर थे। विश्व स्वास्थ्य परिषद के मुताबिक, हेलमेट पहनकर घातक चोट से 72 फीसदी और मौत के खतरे से 39 फीसदी बचाव हो सकता है।

16,000 से अधिक साइकिल सवारों और राहगीरों की मौत को देखते हुए बड़े वाहनों से उन्हें सुरक्षित रखने के लिए व्यावहारिक सीख देने के अलावा, इसके अनुकूल रास्ते और पैदल पारपथ बनाने जरूरी हैं।

-2014 में भारत के 50 बड़े शहरों में सड़क दुर्घटना में 16,611 मौतें हुईं, जिनमें दिल्ली, चेन्नई और मुंबई सबसे ऊपर रहे, लेकिन दिल्ली और चेन्नई में मौतों की संख्या में लगातार कमी आई है। राजधानी को सुरक्षित बनाने में दिल्ली मेट्रो के योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता। हर रोज 20 लाख लोगों को अपने गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचाने वाली मेट्रो ने सड़क पर वाहनों की संख्या में कमी लाकर दुर्घटनाओं से बचाव में मदद की है।

ये आकंड़े साबित करते हैं कि जन परिवहन प्रणाली को दुरुस्त करके भी भारतीय शहरों में सड़क सुरक्षा को काफी सुधारा जा सकता है।

(यह आकड़ा गैर लाभकारी, लोकहित पत्रकारिता मंच, इंडियास्पेंड के साथ एक व्यवस्था के तहत प्राप्त किया गया है। ये लेखक के निजी विचार हैं)

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