विरासत संरक्षण: जागरूकता की जरूरत

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विरासत संरक्षण : जागरूकता की जरूरत
लेखक : ए.के. गांधी
संरक्षण उस विशाल इमारत के समान होता है जिनमें विभिन्न प्रयोजनों की पूर्ति के लिए विभिन्न कक्ष होते हैं। संरक्षण शब्द का प्रयोग जैव विविधता, वातावरण, प्राकृतिक संसाधनों, वास्तुकला विरासत, सांस्कृतिक विरासत आदि प्रयोजनों से होता है। इनमें से प्रत्येक प्रयोजन का सीधा संबंध हमारे जीवन से है, लेकिन इस लेख में हम विरासत संरक्षण की बात कर रहे हैं। विरासत संरक्षण के अंतर्गत विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का संरक्षण किया जाता है जो वास्तुकला, सांस्कृतिक व कला विरासत से संबंधित हैं तथा इनमें विभिन्न प्रकार की इमारतें, रचनाएं, वस्तुएं, चित्र, पुस्तकें, सिक्के आदि सम्मिलित हैं। इनके संरक्षण के लिए समाज के विभिन्न स्तरों पर चिंता जताई जाती है लेकिन व्यक्तिगत रूप से इस संबंध में कम प्रयास ही किए जाते हैं। यह निश्चित है कि बिना व्यक्तिगत रुचि दिखाए विरासत संरक्षण का कार्य पूरा नहीं किया जा सकता जिसका कारण है कि अनेक महत्वपूर्ण वस्तुएं केवल सामाजिक दृष्टि से ओझल हैं या ऐसे स्थानों पर स्थित हैं जहां के लोगों को उसके महत्व के बारे में नहीं पता। अभी हाल ही में रोहतक जाने का अवसर मिला तो एक छोटी-सी गली में स्थित मंदिर में गुप्ताकालीन विष्णु प्रतिमा को देखने का अवसर मिला जिसे एक जल प्रवाह के पास दीवार में ऐसे ही चिन दिया गया था तथा मंदिर में आने वाले सभी लोग उस पर जल चढ़ा रहे थे, लेकिन कोई इस बात की परवाह नहीं कर रहा था कि इसके कारण उस पर काई जम गई थी या उसका एक ओर से क्षरण होता जा रहा था। इस प्रकार के उदाहरण पूरे देश में ही मिलते हैं, विशेषकर गांवों में।कुछ जगह तो सांस्कृतिक व वास्तुकला महत्व की वस्तुओं को नवीन निर्माण से बदल दिया गया है तथा पुरानी वस्तुओं को नष्ट कर दिया गया है, जैसा हम रावण गांव, बागपत में देख सकते हैं। इस गांव का नाम रावण इसीलिए पड़ा क्योंकि यहां स्थित मंदिर की स्थापना रावण द्वारा की गई ऐसा कहा जाता है। इस मंदिर के द्वार पर दो प्राचीन स्तंभ थे जिन्हें तोड़कर उनके स्थान पर नवीन निर्माण करा दिया गया तथा पुराने स्तंभों को तालाब में डाल दिया गया। बाद में उनकी महत्ता ज्ञात होने पर उन्हें वहां से निकलवाकर मंदिर प्रांगड़ में तिरस्कृत रूप से ही रख दिया गया है। इसी प्रकार, शंकरताल, नगलामल गांव, मेरठ में तालाब की खुदाई में कुछ ऐसे अवशेष निकले हैं जिनकी तुलना खजुराहो के मंदिरों से की जा सकती है। इस वर्णन से एक बात यह स्पष्ट रूप से निकलकर आती है कि लोगों में जागरूकता का अभाव है जिसके कारण हम अपने हाथों से ही अपनी सांस्कृतिक विरासत को नष्ट कर रहे हैं। यदि लोगों में जागरूकता पैदा की जाए तो इस प्रकार के क्षरण को रोका जा सकता है जो विरासत संरक्षण में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। भारतीय पुरातत्व विभाग इस दिशा में प्रयासरत है, लेकिन इसके प्रयास मुख्यरूप से केवल प्रसिद्ध स्थानों तक ही सीमित हैं। इसी प्रकार इन्टैक जैसी कुछ संस्थाएं भी इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं, लेकिन उन्हें अभी पर्याप्त विस्तार करने की आवश्यकता है। इस कारण से हम लोगों को स्वयं ही अपने हाथों में बागडोर लेनी होगी ताकि हम अपने इतिहास व संस्कृति से विमुख न हो पाएं तथा अपनी समृद्ध संस्कृति तथा इतिहास में गर्व करते रहें।
(ए.के. गांधी जाने-माने इतिहासकार व अनेक लोकप्रिय पुस्तकों के लेखक हैं।)