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ग़ाजियाबाद दिल्ली एन.सी.आर

अंतिम सस्ंकार के सामान पर भी नोट बंदी का साया

सुभाष शर्मा (करंट क्राइम)
गाजियाबाद। केंद्र सरकार के नोट बंदी के फैसले के बाद इसका असर जन्म से लेकर मरण तक दिखाई दे रहा है। सरकार ने एक हजार और पांच सौ के नोटों को बंद तो कर दिया लेकिन इसके बाद जो त्राहिमाम मचा है उसका असर सबसे ज्यादा मध्यमवर्ग पर पड़ा है। हालांकि सरकार ने अपनी तरफ से कुछ व्यवस्था की थी पर उसका कोई लाभ उस वर्ग को नहीं मिला जिसके लिये ये कदम उठाया गया था। बड़े नोटों की पाबंदी की मार जन्म से लेकर मरण तक पड़ गई। सरकार ने घोषणा की कि शमशान घाट पर हजार और पांच सौ का नोट चलेगा। अब सवाल तो ये है कि नोट तो जब चलेगा जब मुर्दा शमशान घाट पर पहुंचेगा। कोई मर गया तो जायेगा तो वो अर्थी पर सवार होकर ही शमशान घाट तक। जब पैसे ही नहीं होंगे तो कहां से जायेगा। अतिंम संस्कार के सामान का औसत खर्चा लगभग दो से तीन हजार तक होता है। इस खर्च में कफन का खर्च शामिल नहीं है। जिनकी दुकान पर पहले बोर्ड लगा था कि अतिंम संस्कार का सामान नि:शुल्क मिलता है अब वहां बोर्ड दूसरा ही लग गया है। अंतिम संस्कार के सामान की तख्ती के साथ एक नई चिट लग गई है। उस पर लिखा है 1000 और 500। फिर उसकी एक जीरो काट दी गई है। यानी सौ का और पचास का नोट। सदेंश ये है कि हजार और पांच सौ का नोट हो तो अंतिम संस्कार का सामान नहीं मिलेगा। अब मरने वाले को क्या पता था कि देश में ऐसा भी समय आ जायेगा। सबसे अहम बात ये है कि दुकानदार ने तो अपनी कारोबारी मानसिकता दिखा दी पर वो समाजसेवी कहां गए जो मुफ्त मे नमक बांटने की बातें कर रहे थे। क्या ये समाजसेवी मुफ्त में किसी को अंतिम संस्कार का सामान उपलब्ध कराना समाजसेवा का हिस्स नहीं मानते। दुकानों पर तो बोर्ड लटक गये पर क्या समाज सेवियों की संवेदना पर भी ताले लग गये।
बाजार में किसी ने बताया कि समाज सेवियों को तो दूसरे से मांग कर ही ये काम करना था। अपनी जेब से तो उन्होंने आज तक नमक नहीं बांटा हैं। ये भी तो हो सकता था कि चैक के बदले फिलहाल तो सामान उपलब्ध कराया जाता। वैसे भी कौन होगा जो अपने परिजन की अर्थी का सामान लेकर पैसे न दे। गरीब को मुफ्त में कोई अमीर दिलवा देता। इस पीड़ा को उससे ज्यादा कौन जान सकता है जिसका अपना कोई स्वर्ग सिधार गया है और उसे ये इतंजाम करना हैं। काश समाज सेवा का ढोल पीटने वाले समाज सेवी अपनी सवेंदना इस और भी जगा लेते।

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