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पुलिस विभाग ने कर दी लापरवाही की हद, नहीं मिली शहीद परिजनों को कोई मदद

सय्यद अली मेहदी (करंट क्राइम)

गाजियाबाद। शहीदों का सम्मान बेहद जरूरी है। जिन्होंने वतन के लिए अपनी जान उस वक्त दे दी जब वहां की वर्दी धारण कर देश सेवा में लगे हुए थे। लेकिन क्या सिर्फ सम्मान और गार्ड आॅफ आॅनर से ही शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है। क्या सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी पर नहीं बनती। कि शहीदों के परिवार को उनकी शहादत पर गर्व की अनुभूति कराएं।
शायद आप भी इस बात से सहमत होंगे। लेकिन हमारी पुलिस उन जवानों को भूल गई। जिन्होंने अपने फर्ज को अंजाम देते वक्त जाम ए शहादत पी लिया था। गत 3 वर्षों में गाजियाबाद में सात पुलिसकर्मियों की शहादत हुई है। लेकिन सभी के परिवारों के साथ सरकारी मशीनरी ने बहुत बेहतर सलूक नहीं किया। न ही शहीद पुलिसकर्मियों के परिवारों बारे में सोचा है, जिन्होंने फर्ज के लिए अपनी जान देश के नाम न्यौछावर कर दी। पुलिस लाइन में प्रत्येक वर्ष 21 अक्टूबर को शहीदी दिवस मनाया जाता है। जिसमें शहीद पुलिसकर्मियों के परिजनों को सम्मानित कर इस बात का अहसास कराया जाता है कि आपका परिवार देश के काम आया है और इन शहीदों पर पुलिस विभाग को गर्व है। लेकिन यह सिलसिला सिर्फ पारितोषक, शॉल और सन्मानचिन्ह तक ही सीमित रह जाता है । जबकि जीवन का शाश्वत नियम है की हर इंसान को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पैसे की आवश्यकता भी होती है।
हेड कांस्टेबल-लखमी सिंह
गत वर्ष 24 अक्टूबर को लखमी सिंह उस वक्त सड़क हादसे में घायल हो गए थे, जब मोहर्रम के दिन वह चौधरी मोड़ के पास यातायात व्यवस्था को नियंत्रित कर रहे थे। घायल लखमी सिंह को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 20 नवंबर 2015 को अपने प्राण त्याग दिए। पुलिस ने गॉर्ड आॅफ आॅनर देकर लखमी सिंह की शहादत को सलामी दी थी। मूलरूप से लखमी सिंह का परिवार बुलंदशहर के मानपुर गांव का रहने वाला है। वर्तमान में पूरा परिवार पुलिस लाइन में रह रहा है।
समस्या- इस संबंध में शहीद लख्मी सिंह के बेटे भूपेंद्र सिंह ने बताया कि अभी तक ना तो मृतक आश्रित नौकरी मिली है और ना ही परिवार पेंशन मिलना शुरू हुई है। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने 10 लाख रुपए की अनुदान राशि की घोषणा भी की थी। उसका भी अब तक कोई पता नहीं है पुलिस आॅफिस जाते हैं। तो बस कह दिया जाता है कि फाइल भेज दी है। पुलिस मुख्यालय से ही आदेश आएंगे तब कुछ हो सकेगा।
आरक्षी-श्याम सिंह
श्यामवीर सिंह मदनगीर विलेज नई दिल्ली के मूल निवासी थे, जो कि एक सड़क हादसे में घायल हो गए थे और अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही श्यामवीर की मौत हो गई थी। 25 अप्रैल 2016 को हुए इस हादसे के समय श्यामवीर एक मामले की जांच के लिए कुछ प्रपत्र लेकर थाना लिंक रोड से पुलिस आॅफिस आ रहे थे।
समस्या – शहीद श्यामवीर सिंह के परिवार ने भी अब आप छोड़ दिए उनके परिवार का कहना है। कि पुलिस आॅफिस से लेकर लखनऊ और इलाहाबाद के चक्कर काट लिए। कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। ना कोई आर्थिक सहायता मिली ना नौकरी मिली और अब तो इस संबंध में कोई पुलिस अधिकारी भी बात करने को तैयार नहीं।
आरक्षी-सुरेश पाल सिंह
सिपाही सुरेश पाल सिंह भी एक सड़क हादसे में बुरी तरह घायल हुए थे, जिन्होंने मौके पर ही अपने प्राण त्याग दिए थे। 4 जनवरी 2016 को बाइक सवार सुरेश पाल को किसी अज्ञात वाहन ने जबरदस्त टक्कर मार दी थी, जिसके चलते उनकी मौत हो गई थी। सुरेश पाल का परिवार पुलिस लाइन में ही रह रहा है।
समस्या- शहीद सिपाही सुरेश पाल सिंह के परिवार का भी हाल अन्य शहीद परिवारों के जैसा ही है जिन्हें पुलिस शहीद दिवस पर 5000 रुपए एक साल और सन्मानचिन्ह के अलावा अब तक पुलिस महकमा कुछ नहीं दे सका है चक्कर भी काटे और मिन्नतें भी की लेकिन किसी खाकीधारी का दिल नहीं पसीजा।
आरक्षी-विजय कुमार
विजय कुमार का एक्सीडेंट खतौली के पास हाईवे पर हुआ था। जब वह एक गवाही के सिलसिले में मुजफ्फरनगर जा रहे थे। बाइक सवार विजय कुमार को तेज रफ्तार ट्रक ने टक्कर मार दी थी। जिसके बाद विजय ने मौके पर ही दम तोड़ दिया था। विजय का परिवार गली नंबर-13 न्यू विकास नगर लोनी में रहता है।
समस्या- सिपाही विजय कुमार की मौत के बाद सही उनका परिवार मुजफ्फरनगर चला गया। मौत के बाद 6 महीने तक परिवार ने पेंशन सरकारी नौकरी और आर्थिक सहायता के लिए खूब हाथ पैर मारे। लेकिन कहीं कोई हल नहीं निकला । जिसके बाद थक हारकर शहीद के परिजनों ने अपने पैतृक गांव जाना ही मुनासिब समझा।
आरक्षी-सुदेश यादव
सिपाही सुदेश यादव की मौत को शायद ही कोई भूल सके। पुलिस चौकी में वर्दी पहने बैठे सुदेश को बदमाश ने उस समय गोली मार दी जब उन्होंने शराब के लिए पानी देने से मना कर दिया। हालांकि पुलिस ने 24 घंटे के अंदर ही बदमाश ओमी खड़खड़ी को मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार कर लिया था। सुदेश की हत्या के बाद पुलिस विभाग में सनसनी फैल गई थी। गॉर्ड आॅफ आॅनर के बाद सुदेश के शव को उसके मूल गांव भजनपुर जनपद एटा भेजा गया था।
समस्या – मालूम करने पर पता चला कि सुदेश यादव की क्लोजिंग रिपोर्ट दो बार अधूरी डिटेल के साथ भेज दी गई थी। जिसके बाद इलाहाबाद पुलिस मुख्यालय से दो बार रिटर्न रिमाइंडर भी आ चुका है। लेकिन अभी तक इस संबंध में मेरठ जोन मुख्यालय से अंतिम रिपोर्ट नहीं भेजी जा सकी है। जिसके चलते सुदेश के परिवार को मरणोपरांत मिलने वाली आर्थिक सहायता अभी तक नहीं मिल सकी है।
हेड कांस्टेबल- रामवीर
गत वर्ष एक सड़क हादसे में हेड कांस्टेबल रामवीर सिंह भी बुरी तरह घायल हो गए थे। जिनकी कुछ समय बाद इलाज के दौरान अस्पताल में मौत हो गई थी। रामवीर सिंह के परिवार के 5 लोग पुलिस सेवा में हैं। रामवीर का परिवार लोनी में रहता है।
समस्या- हेड कांस्टेबल शहीद रामवीर सिंह के परिवार में पांच लोग पुलिस सेवा में रहे हैं। लोनी निवासी यह परिवार भी सरकारी अनुदान आर्थिक सहायता मृतक आश्रित नौकरी और पेंशन के लिए ठोकरें खाता रहा। हालांकि इस परिवार की पारिवारिक पेंशन गत माह ही शुरू हो सकती है। लेकिन अन्य लाभ अभी तक परिवार को नहीं मिले।
आरक्षी-संजीव कुमार
ग्राम सौंदा के रहने वाले संजीव कुमार का एक्सीडेंट 23 दिसंबर 2015 को हुआ था। जिनकी शहादत की खबर सुनकर पूरे निवाड़ी क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई थी। हादसे में मौके पर ही संजीव ने दम तोड़ दिया था। संजीव को दो बार एसपी देहात एवं क्षेत्राधिकारी बेहतर कार्य के लिए सम्मानित भी कर चुके थे।
समस्या- ग्राम सौंदा निवासी शहीद सिपाही संजीव कुमार का परिवार भी खेती कर अपना पालन पोषण कर रहा है। इस परिवार को भी किसी प्रकार की कोई सरकारी सहायता, अनुदान, आर्थिक मदद आदि नहीं मिली है। जबकि मृतक की पत्नी के नाम सिर्फ पेंशन ही शुरू हो सकी है।

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