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बिखरे हुए किले से कैसे भीड़ जुटाएगा रैली के लिए हाथी

वरिष्ठ संवाददाता (करंट क्राइम)

गाजियाबाद। बसपा 18 सितंबर को मेरठ में एक विशाल रैली करने जा रही है। इस रैली का प्रभारी एमएलसी सुरेश कश्यप को बनाया गया है। रैली को बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती संबोधित करेंगी। गाजियाबाद में बसपा के लिए यहां से भीड़ जुटाना एक बड़ी चुनौती है। वर्ष 2012 में बसपा ने यहां जो किला बनाया था, वह 2017 में बिखर गया है। कभी यहां चारों सीटों पर बसपा ने जीत का परचम लहराया था। शहर सीट से सुरेश बंसल ने बसपा के लिए पहली बार जीत का खाता खोला। साहिबाबाद जैसी बड़ी विधानसभा से अमरपाल शर्मा बसपा के लिए जीत लेकर आए। मुरादनगर विधानसभा सीट से वहाब चौधरी जीते तो लोनी से हाजी जाकिर अली विधायक बने। वर्ष 2017 बसपा के लिए अच्छा नहीं रहा। बसपा यहां सभी सीटों पर चुनाव हार गई। चुनाव हारने के बाद हाथी का किला लखनऊ से लेकर गाजियाबाद तक बिखर गया।
चुनाव की हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ने के बाद बसपा सुप्रीमो ने ऐलान किया कि हर महीने की 11 तारीख को ईवीएम विरोध में प्रदर्शन होगा। पहले प्रदर्शन में ही न जाने क्या हुआ कि अगले प्रदर्शन की तारीख ही नहीं आई। इसके बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेता ने बसपा छोड़ दी। बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। हाथी को उम्मीद थी कि इस्तीफे के बाद बसपा समर्थक एकजुट हो जाएंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। गाजियाबाद में ही बसपा का हाथी इन दिनों अलग-थलग अवस्था में है। नसीमुद्दीन के बसपा छोड़ने के बाद बसपा के पूर्व विधायक हाजी जाकिर अली और साहिबाबाद से विधानसभा प्रत्याशी जलालुद्दीन सिद्दीकी ने बसपा छोड़ दी। इसके बाद रहीसुद्दीन सलमानी हाथी को अलविदा कहकर चल दिए। पूर्व विधायक प्रशांत चौधरी भी बसपा छोड़ चुके हैं और अमरपाल शर्मा भी पहले ही हाथी को त्याग पत्र सौंप गए थे। मुरादनगर सीट से बसपा ने कविंद्र चौधरी का टिकट काटकर सुधन रावत को टिकट दिया था। आज सुधन रावत कहां है, किसी को नहीं पता। राजनीति से उन्होंने लगभग सन्यास सा ले लिया है। कई बसपा नेता अब बसपा कार्यालय का रास्ता भूल चुके हैं। कई को लग रहा है कि हाथी में अब राजनीति का फ्यूचर बचा नहीं है। नरेंद्र कश्यप चुनाव से पहले ही बसपा से आउट हो गए थे और भाजपाई बन गए। बसपा के पास यहां अब कोई ऐसा नेता नहीं बचा है, जो जनाधार को तोल सके। पूर्व विधायक सुरेश बंसल इस मामले में जरूर अपवाद है। वह जनाधार भी रखते हैं और बसपा के प्रति निष्ठावान भी। संगठन के नेताओं में भी ऊर्जा का अभाव है। जिलाध्यक्ष रामप्रसाद प्रधान जरूर अपने दम पर कोशिश करते हैं। उनके सामने समस्या बाहर वालों से नहीं बल्कि भीतर वालों से है। वह संगठन में जान फंूकने की कोशिश करते हैं और विरोध का सामना भी उन्हें संगठन वालों से ही करना पड़ता है। अब बिखरे हुए किले में बड़ी चुनौती भीड़ जुटाने की है।
क्या राइन सफल हो पाएंगे मुस्लिमों को ले जाने में
बसपा प्रभारी राइन को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम वर्ग को बसपा से जोड़ने की है। गाजियाबाद में यह चुनौती बड़ी है। मुरादनगर से बसपा विधायक रहे वहाब चौधरी का यहां मुस्लिमों में मजबूत जनाधार माना जाता है। अब वह बसपा में नहीं है। ऐसे में इस वोट बैंक को राइन किस तरीके से हाथी से जोड़ेंगे, यह देखने वाली बात है। इसी तरह लोनी में हाजी जाकिर अली का अपना जनाधार है। गाजियाबाद में जलालुद्दीन सिद्दीकी मुस्लिमों में अपनी पकड़ रखते हैं। नसीमुद्दीन के बसपा छोड़ने के बाद हाथी पर मुस्लिम ग्रहण तो लगा है। मुस्लिम इस बात से नाराज हैं और इस नाराजगी को खत्म कर मुस्लिमों को हाथी से जोड़ना राइन के लिए बड़ी चुनौती है।
प्रत्येक विस से जाएंगे हजारों कार्यकर्ता: रामप्रसाद
बसपा जिलाध्यक्ष रामप्रसाद प्रधान का कहना है कि जिले से ढाई सौ बसे ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। प्रत्येक विधानसभा से 40-40 बस जाएंगी। साहिबाबाद विधानसभा से 55 बसों में कार्यकर्ता पहुंचेंगे। इसके लिए सभी विधानसभा प्रभारियों और विधानसभा क्षेत्र अध्यक्षों को जिम्मेदारी दी जा रही है। इसके अलावा 800 कारों से भी कार्यकर्ता मेरठ रैली में पहुंचेंगे। उनका कहना है कि बसपा का कैडर वोट कहीं नहीं खिसका है। बसपा कार्यकर्ता आपस में ही सहयोग कर पूरी व्यवस्था कर रहे हैं। भीड़ की चैकिंग के लिए भी पार्टी स्तर पर चैक पोस्ट बनाई गई है। इन पर बामसेफ के नेता निगरानी रखेंगे।

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