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हज हाउस ही नहीं कई मामले खड़े कर रहे हैं पुलिस-प्रशासन की वर्किंग पर सवाल

सुभाष शर्मा (करंट क्राइम)

गाजियाबाद। प्रशासन का काम जिले में कानून व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू कराने का है। बड़ी बात यह है कि प्रशासन के और पुलिस के अधिकारी तो स्थिति पर निगाह रखते हैं और मौके पर पहुंचते भी हैं लेकिन तब तक देर हो जाती है। कई ऐसे मामले हुए हैं जब स्थिति को पहले ही संभाला जा सकता था लेकिन निचले स्तर के अधिकारियों की लापरवाही से मामला बिगड़ गया। आखिर अधिकारी सही समय पर अपने बड़े अधिकारियों को सही स्थिति से क्यों अवगत नहीं कराते हैं। लोनी में मंडोला के आंदोलनरत किसानों को प्रशासन क्यों नहीं संभाल पा रहा। कभी राजनीतिक दलों के नेता यहां आते हैं तो कभी स्थानीय किसान नेता माहौल को बिगाड़ देते हैं।
अधिकारी आखिर क्यों काबू नहीं कर पा रहे। वह सरकार की ओर से ऐसा आश्वासन किसानों को क्यों नहीं दे पा रहे जिससे किसान उनका विश्वास कर लें। फीस वृद्धि के विरोध में अभिभावक जिलामुख्यालय पहुंचे थे। तत्कालीन जिलाधिकारी निधि केसरवानी से ना जाने क्या बात हुई और अभिभावक हापुड़ चुंगी पहुंच गये। यहां जाम भी लगा, लाठी चार्ज भी हुआ और सरकार के प्रति सकारात्मक संदेश भी नहीं गया। बड़ी बात ये है कि एक डिप्टी कलैक्टर मौके से गायब हो गये थे और एक बुलाने के बावजूद भी नहीं पहुंचे थे।
ये हाल प्रशासन के अधिकारियों का है। एडीएम सिटी प्रीति जायसवाल ने इन दोनों डिप्टी कलैक्टरों की इस हरकत को लेकर बाकायदा पत्र भी लिखकर जवाब मांगा था। साहिबाबाद थाने में युवक की मौत के मामले में भी पुलिस अधिकारी तब तक नहीं जागे जब तक जनता सड़क पर नहीं आ गयी। थाने में मौत हो गयी और पुलिस के कोतवाल और सिपाही लगातार एसएसपी को गुमराह करते रहे। जीडीए के अधिकारी सीलिंग अभियान चला रहे थे। एलआईयू के पत्र बता रहे थे कि माहौल बिगड़ सकता है।
कनावनी के एक निर्माण को लेकर तो जीडीए वीसी जेसीबी चलाना चाहती थीं और एसएसपी ने बाकायदा जिलाधिकारी को पत्र लिख दिया कि शांति व्यवस्था भंग हो सकती है। नियमों के साथ साथ शहर की शांति देखना भी प्रशासन का ही काम है। अब भी शहर सुलग रहा है और प्रशासन को समय रहते कदम उठाने होंगे। विजय नगर में यूपीएसआईडीसी द्वारा अम्बेडकर कालोनी के मामले को लेकर प्रशासन को सजग रहना होगा। यहां पहले भी बवाल हो चुका है। शिक्षामित्र धरना दे रहे हैं। वहीं अभिभावक समिति के लोग भी धरना दे रहे थे। अगर सरकार के मंत्री वहां जा रहे हैं तो उनकी सुरक्षा और शांति व्यवस्था कायम रखना किसका काम है। हंगामा और हमला कभी प्रशासन से पूछकर नहीं होता। भीड़ और हिंसा का बहुत ही नजदीकी रिश्ता है। प्रशासन अभी भी समय रहते मुददों को चिंगारी से शोला बनने से पहले ही रोके। जब हज हाउस पर ताला एनजीटी के आदेश के बाद लगा है तो प्रशासन और पुलिस ने वहां धरना होने ही क्यों दिया। जब कांग्रेसी वहां पहुंचे थे तो क्या तभी सिटी मजिस्ट्रेट और एसपी सिटी को नहीं पहुंचना चाहिए था। पुलिस आखिर शाम होने का इंतजार क्यों कर रही थी। हज हाउस पर जब पथराव और लाठी चार्ज हुआ तो मुख्य मार्ग पर यातायात चल रहा था। भीड़ यदि और हिंसक हो जाती और सड़क पर आ जाती तो कितने बेगुनाहों पर हमला हो जाता।
खुफिया एजेंसियां लगातार अपने पत्रों से प्रशासन को अवगत कराती हैं, लेकिन इन जानकारियों पर मॉनिटरिंग नहीं हो पाती। लोनी में एसडीएम रहते हुए आईएएस प्रेमरंजन सिंह ने कई मुददों पर पत्र लिखकर सीओ को कार्यवाही करने को कहा। विडम्बना देखिये कि आईएएस अधिकारी के पत्र लिखने के बाद भी सीओ ने कोई कार्यवाही नहीं की और उन्हें दोबारा पत्र लिखने पड़े। जब जिले में धारा 144 लागू है तो फिर धरना क्यों हो रहा है और हज हाउस पर भीड़ कैसे इकटठा हो गयी। गलती किसकी है। प्रशासन इस बात का भी ध्यान रखे कि ये वही जिला है जहां मसूरी में प्रशासन की लापरवाही से ही दंगा हुआ था और पड़ौस के जनपद में बिसाहड़ा कांड हो गया था।

जब धामा मांग रहे हैं सुरक्षा, तो क्यों नहीं हो रही समीक्षा
जनपद में ऐसा भी हुआ जब एक व्यवसायी अरसी मलिक पुलिस कप्तान के यहां लगातार अपनी जान को खतरा बताकर सुरक्षा मांग रहे थे। पुलिस को लगा कि क्या जरूरत है और उनकी हत्या हो गयी। ये मामला तब का है जब सूबे में सपा सरकार थी। अब तो सरकार बदल गयी है तो दरकार भी बदल जानी चाहिए। इससे बड़ी बात क्या होगी कि लोनी नगरपालिका परिषद के चेयरमैन जैसे पद पर आसीन मनोज धामा ने अपनी जान को खतरा बताते हुए सुरक्षा मांगी। मनोज धामा के पास शस्त्र लाईसेंस भी नहीं है। मनोज धामा जिलाधिकारी से लेकर एसएसपी से मिल चुके हैं और अभी तक वह सुरक्षा को महरूम हैं। खास बात यह है कि उन्होंने तो अब सार्वजनिक रूप से सुरक्षा की गुहार लगाई है। मनोज धामा भाजपा से ही निर्वाचित चेयरमैन हैं।
यदि जनता सड़कों पर है तो फिर तहसील दिवस का मतलब क्या
शासन की ओर से तहसील दिवस, समाधान दिवस, थाना दिवस आखिर किसके लिये आयोजित किये गये हैं। सरकार चाहती है कि जनता को त्वरित न्याय मिले। इन दिवसों का मतलब ही यही है कि यदि निचले स्तर का कोई अधिकारी नहीं सुन रहा है तो जिले के आला अधिकारी एक साथ बैठकर समस्या सुनें और उसका समाधान करें। ये सरकार की वो व्यवस्था है जहां गरीब को इंसाफ दिया जाना है और जब उसकी समस्या का मौके पर ही समाधान होगा तो सरकार के प्रति उसकी आस्था भी बढ़ेगी। लेकिन यदि यहां भी अधिकारी समाधान के बजाये अपने विभाग का पक्ष लेंगे तो जनता में असंतोष बढ़ेगा और सरकार की सिरदर्दी बढ़ेगी। जब थाने और चौकियों में सुनवाई नहीं हो रही तभी तो फरियादियों की भीड़ पुलिस कप्तान के दरवाजे पर है। क्या पुलिस कप्तान अपने उन कोतवालों और दरोगाओं के खिलाफ कार्यवाही नहीं कर सकते जो भीड़ को उनके दरवाजे भेज रहे हैं। अगर दरोगा और कोतवाल समाधान नहीं कर रहे तो उन्हें बदला भी तो जा सकता है।

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