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नगर निगम की फाइलों पर ही मर गये फॉगिंग से मच्छर

वरिष्ठ संवाददाता (करंट क्राइम)

गाजियाबाद। गाजियाबाद। हर साल महानगर में मच्छरो का प्रकोप फैलता है। हर साल सरकार के खजाने से एक बड़ी रकम मच्छरो के एनकाऊंटर के लिये निगम के खजाने में आ जाती है। मच्छरो से लड़ने के लिये बाकायदा मलेरिया फाइलेरिया विभाग भी है। जिला मलेरिया अधिकारी भी है और नगर निगम मे बाकायदा फागिंग दस्ता भी बना है। बावजूद इसके ये मच्छर हर साल हजारो लोगो को अस्पताल का रास्ता दिखा देते है। हर साल बुखार से पीड़ित लोगो का मेला डाक्टरो के दरवाजे पर लगता है। सवाल ये है कि यदि नगर निगम मच्छरो के सफाये के लिये फागिंग अभियान चला रहा है तो फिर ये मच्छर मरते क्यो नही है। अगर भाजपा के बड़े नेताओ से लेकर सरकारी अधिकारी तक स्वच्छता अभियान चला रहे हैं तो फिर सफाई क्यों नही हों रही है। ये वो सवाल है जो अपने आप में इस बात का आईना है कि केवल खानापूर्ती हो रही है।
लोग शिकायते कर रहें हैं और ना निगम पर कोई असर है और ना ही जनप्रतिनिधि इस पर ध्यान देना जरूरी समझते हैं। अगर शहर में फागिंग हुई है तो नगर निगम इसके आकंडे क्यो नही देता है। सूत्र बता रहे हैं कि निगम की फागिंग मशीने धूल फांक रही है। फागिंग के नाम पर केवल ंदो चार इलाको में मशीन ने धुंआ छोडा और बाकी शहर को उसके हाल पर छोड़ दिया।
जोनवार चलने वाला अभियान भी हो
गया फेल
मच्छरो को मारने के लिये निगम में बाकायदा जोन में दिन के हिसाब से फागिंग अभियान चलना था। नगर निगम में प्रत्येक जोन में दिन के हिसाब से फागिंग का चार्ट बनाया गया था। जोन के हिसाब से प्रतिदिन फागिंग होनी थी। यह चार्ट सितबंर अक्तूबर तक का तैयार हुया है। लेकिन सच ये है कि फागिंग केवल फाइलो में ही हो गयी। आकंडो के खेल में फाइलो पर ही फागिंग हो गयी और फाइलो पर ही मच्छर मर गये। केवल कुछ इलाको में ही कुछ मौको पर फागिंग मशीन के दर्शन हुये। अनेक इलाके ऐसे है जहां लोगो ने फागिंग मशीन देखी भी नही और निगम की फाइलो पर कई बार इन इलाको में फागिंग हो चुकी है। अब हो सकता है कि लोग झूठ बोल रहे हो। क्योकि निगम की फाईल तो झूठ बोल ही नही सकती। काश एक बार नगरआयुक्त इन इलाको में लोगो के बीच जाकर भी जमीनी हकीकत जान लेते।
कहां गया निगम का फॉगिंग दस्ता और साइकिल

तत्कालीन नगरआयुक्त अजय शकंर पांडेय के समय में नगर निगम में बाकायदा फागिंग दस्ते का निर्माण किया गया था। फागिंग मैन बनाये गये थे और इस दस्ते को मिनी फागिंग मशीनो के साथ साईकिले भी दी गयी थी। इसका उददेश्य यह था कि जिन गलियो में बड़ी फागिंग मशीन नही जा सकती वहां पर साईकिल वाला फागिंग मैन जाकर फागिंग करेगा ताकि इन संकरी गलियो में रहने वाले लोगो को भी मच्छरो के प्रकोप से मुक्ति मिल सके। आज ये दस्ता कहां है किसी को नही पता। निगम के खजाने से पैसा खर्च कर दी गई साईकिले कहां गई किसी अधिकारी को खबर नही है। सूत्र बता रहे है कि ये साईकिले निगम कर्मचारी अपने अपने घर ले गये। इनमें से कई साईकिले तो कबाड़ी खरीद कर भी ले गये। नगरआयुक्त यदि इसी मामले की जांच करा ले तो पता चल जायेगा कि सरकार के खजाने से पैसा खर्च होने के बाद भी आखिर फागिंग अभियान क्यो फ्लाप हो गया।

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