Breaking News
Home / अन्य ख़बरें / दोराहे पर खड़ा किसान

दोराहे पर खड़ा किसान

हर सरकार चुनाव के समय किसानों की सबसे बड़ी हितैषी होने का दावा करती है। लेकिन सरकार किसी भी पार्टी की हो किसानों से जुड़ी समस्याओं को लेकर आंदोलन समाप्त नहीं होते। आज लोनी के मंडोला से लेकर मध्यप्रदेश के मंदसौर तक किसान आंदोलन कर रहे हैं। इस बीच कर्ज से परेशान किसानों की आत्महत्या के मामले भी सामने आ रहे हैं। यूपी के कोशाम्बी जिले में आलू की फसल में नुकसान होने पर किसान रामबाबू ने बाग में फांसी लगाकर जान दे दी। रामबाबू ने तीन बैंको से खेती के लिए सवा तीन लाख रूपए कर्ज ले रखा था। वहीं मध्यप्रदेश में भी दो और किसानों ने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या का कारण कर्ज से परेशान होना बताया जाता है। किसानों की मौत के बाद अब मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज चौहान ने पुलिस फायरिंग में मारे गए लोगों के परिजनों को एक एक करोड़ रूपए का चैक सौपा है। सवाल इस बात का है कि सरकार किसानों को जिंदा रहते तीन लाख रूपए के कर्ज से राहत नहीं दे पाती है और उनकी मौत के बाद एक करोड़ का चैक सौपती है। किसानों को लेकर केन्द्र और राज्यों के बीच भी संवाद का अभाव है। राज्य चाहते हैं कि किसानों की ऋण माफी के लिए केन्द्र मदद करे, और देश के वित्त मंत्री अरूण जेटली ने साफ कह दिया कि किसानों की ऋण माफी का खर्च राज्य अपने खजाने से दें, इसके लिए केन्द्र पैसा नहीं देगा। केन्द्र मना कर रहा है और उत्तर प्रदेश सरकार ने छोटे और मझोले किसानों के कृषि ऋण माफ करने की घोषणा की थी। आज देश का किसान दोराहे पर खड़ा है। किसानों को समझ ही नहीं आ रहा कि वह एक ही पार्टी की कौन सी सरकार पर भरोसा करें। राज्य सरकारें ऋण माफी का आशवासन दे रही हैं और केन्द्र सरकार के वित्त मंत्री स्पष्ट मना कर रहे हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने चुनावी वायदे के तहत किसानों के करीब 36 हजार करोड़ रूपए के कर्जे माफ करने की घोषणा की थी। तीन महीने बीतने को हैं और सरकार ये तय नहीं कर पायी है कि कर्ज कैसे माफ होगा। उत्तर प्रदेश सरकार ने केन्द्र से 13.50 हजार करोड़ रूपए मांगे हैं। खास बात ये है कि इस 13.50 हजार करोड़ में कहीं भी किसान का जिक्र नहीं है। यहां सड़क, पुल, एक्सप्रैसवे, ग्रामीण आवास योजना तो है लेकिन कर्ज से परेशान किसान सरकार के बजट से बाहर दिख रहा है। अब वो हरिओम पवार जैसे कवि भी नहीं दिख रहे जो पहली सरकार में किसानों की आत्महत्या पर मंचो से कविता गा रहे थे कि कर्ज से मरते किसान को, नींद कैसे आ रही है देश के प्रधान को। भारत में अजीब विडम्बना है। भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां कर्जदार अमीर देश छोड़ देते हैं और गरीब कर्जदार किसान दुनिया छोड़ रहा है। किसानों को कर्ज और मौत के बीच दोराहे पर लाकर किसने खड़ा किया है। ये बात निकली है तो किसानों तक भी पहुंचे और उन तक भी पहुंचे जो अब अर्थ शास्त्र समझा रहे हैं।

Check Also

फैडरेशन आॅफ राजनगर एक्सटेंशन पदाधिकारियों ने किया प्रदर्शन

Share this on WhatsAppकरंट क्राइम गाजियाबाद। फैडरेशन आॅफ राजनगर एक्सटेंशन एओए पदाधिकारियों ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *