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क्यों एक्टिव नजर नहीं आ रहे भाजपा के मेयर टिकट के दावेदार

टिकट की आस, चुनाव पास और गर्मी में दे रहे हैं ठंडे का एहसास

प्रमुख संवाददाता (करंट क्राइम)

गाजियाबाद। मौका कुछ लिफ्ट कराने का है। लेकिन ट्विस्ट है कि नजर ही नहीं आ रहा। यूं तो मेयर टिकट को लेकर भाजपा में दावेदारों की लंबी चौड़ी फेहरिस्त है। सब अपने तरीके से दावेदारी भी कर रहे हैं। मगर गर्मी के सीजन में भाजपा नेताओं का ठंडापन समझ से परे नजर आ रहा है। सब टिकट तो मांग रहे हैं लेकिन दावेदारी कोई भी खुलकर नहीं कर रहा है। चर्चा है कि दावेदारी अगर खुल कर कर दी तो लिस्ट से नाम कटने का डर है।
बात सिविल डिफेंस के पूर्व चीफ वार्डन ललित जायसवाल की की जाए तो दावेदारी की दौड़ में इस वक्त वह काफी एक्टिव है। सीएम योगी की हाल ही में हुई कवि नगर वाली सरकारी सभा के बहाने खुद को जायसवाल रंग दे तू मोहे गेरुआ कर चुके हैं। यानी अब श्री जायसवाल के होर्डिंग पर कमल खिलने लगा है। साफ संकेत है कि अब ललित जायसवाल ने अपने इरादों को जाहिर करना शुरू कर दिया है।
बावजूद इसके चर्चा यह है कि श्री जायसवाल थोड़े से रिजर्व नेचर के हैं। इसलिए एक नेता को जिस अंदाज में आम से लेकर खास आदमी से मिलना चाहिए उस अंदाज में वह अभी नजर नहीं आ रहे। साहिबाबाद के गुर्जर नेता ने करंट क्राइम से कहा कि मैं कई चुनाव लड़ चुका हूं। काफी सक्रिय भी रहता हूं। खुद एक विशेष चुनाव की तैयारी में हूं। बावजूद इसके जब एक दिन मैं ललित जी के सामने आया तो उन्होंने मुझे ठीक से पहचाना भी नहीं। जबकि तवज्जो देना तो दूर की बात थी। वही जब मैं दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष को बधाई देने गया तो मुझे देखते ही टिकट की दावेदारी कर रहे दिनेश गोयल ने गले से लगा लिया। फिलहाल ऐसा क्यों है इस पर ललित जायसवाल को गौर करने की जरूरत है। बात दिनेश गोयल की आई है तो पार्टी में उनकी भी दावेदारी की जबर्दस्त चर्चा है।
एक चर्चा यह भी है कि दिनेश गोयल को अब अपने कॉलेज की दीवारों से बाहर आकर भाजपा के सक्रिय वाली राजनीति में भाग लेना होगा। नहीं तो लंच और डिनर डिप्लोमेसी भाजपा में चलती आई है और चलती रहेगी। इसी डिप्लोमेसी में दिनेश गोयल की दावेदारी उलझ कर रह गई है। हालांकि उनकी जिंदादिली और व्यवहार के सब कायल हैं। लेकिन विरोधी उनकी सक्रियता को निशाना बना सकते हैं। तीसरा नाम इस फेहरिस्त में पूर्व क्षेत्रीय उपाध्यक्ष विजय मोहन का है। विजय मोहन भी इस बार कुछ सीरियस नजर आ रहे हैं। पुराने कार्यकर्ता हैं लेकिन चर्चा यही है कि उनकी तरफ से छोड़े गए तीखे तीर अब उन्हीं की ओर मुड़ चुके हैं। अब इन तीरो को वह कैसे हैंडल करते हैं यह देखना रोचक होगा। उन्हीं की तरह भाजपा के पूर्व महानगर अध्यक्ष चंद्रमोहन शर्मा भी पूरी ताकत से फेसबुक पर अपनी दावेदारी को धार दे रहे हैं । फेसबुक पर अक्सर दिखाई देने वाले भाजपाइयों ने उनकी दावेदारी को सीरियस भी मान लिया है। लेकिन एक चर्चा यह भी है कि जिस अंदाज में ललित जायसवाल और दिनेश गोयल बल्लेबाजी कर रहे हैं। उसके सामने इनकी फील्डिंग कुछ कमजोर है।
एक चर्चा यह भी है कि जब पार्टी पुराने चेहरे के तौर पर दिवंगत महापौर तेलु राम कंबोज को टिकट दे सकती है तो फिर इनके नाम पर विचार क्यों ना हो। कहने वाले यह भी कह रहे हैं कि मेरे देश की तरह भाजपा भी बदल रही है। इसलिए पुराना क्या होता है अब तो बाहरी पर भी विचार होने लगा है। यहां पर सबसे चौकाने वाला नाम पूर्व विधायक एवं भाजपा की राजनीति में चंद दिनों में छा जाने वाले प्रशांत चौधरी का भी है। प्रशांत चौधरी भले ही कुछ भी खुलकर ना बोल रहे हो लेकिन भाजपा में अंदरखाने इस बात की जबरदस्त सुगबुगाहट है की टिकट की वर्किंग पर भी काम चल रहा है। इसलिए हर कार्यक्रम में प्रशांत चौधरी के होर्डिंग नजर आ रहे हैं। यहां पर गेम फिनिशर एवं निर्विरोध पार्षद अनिल स्वामी का भी जिक्र करना होगा। स्वामी मजबूत नेता हैं। ब्राह्मण समाज में मजबूत पहचान है और पार्टी के लिए काफी लंबे समय से समर्पित है। इस बार वह घोषणा भी कर चुके हैं कि टिकट हो या ना हो पार्षद का चुनाव नहीं लड़ेंगे। सवाल यह है कि क्या पार्टी उनके नाम पर सीरियसली विचार कर रही है या नहीं। दावेदारी की दौड़ में अनिल स्वामी की भागदौड़ ज्यादा नजर नहीं आती।
अगर पार्टी ने ब्राह्मण चेहरे पर विचार किया तो अनिल स्वामी की दावेदारी को कमजोर नहीं आंका जा सकता। राजनीति के शतरंज पर उनके भी कहीं मजबूत आका बताया जाते हैं। युवा राजनीति में अपनी मजबूत दखल रखने वाले भाजपा के क्षेत्रीय मंत्री मयंक गोयल भी टिकट की दावेदारी में गंभीर माने जा रहे हैं। भले ही पिछले चुनाव में उनका विधानसभा वाला टिकट ना हुआ हो। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि युवा राजनीति को प्रमोट करने के लिए पार्टी मयंक पर भी दांव खेल दे तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। परिवार का पुराना राजनीतिक इतिहास और मयंक की लगातार सक्रियता उनके लिए रास्ते बना रही है। इस बार भी वह लॉबी मयंक के खिलाफ माहौल बना सकती है। जिसने 2017 के विधानसभा चुनाव में इनका गेम बिगाड़ने का काम किया था। फिलहाल उम्मीद पर दुनिया कायम है और मयंक गोयल को उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। भाजपा के पूर्व क्षेत्रीय कोषाध्यक्ष पवन गोयल इस बार क्या जोर का झटका धीरे से देंगे इस पर सब की नजर है। पवन गोयल भाजपा की राजनीति में जाना पहचाना नाम है। हर चुनाव में इनकी दावेदारी रहती है। लेकिन अंत में उनका नाम गेम से आउट हो जाता है। नगर निगम के एक्ट काइन्हें काफी ज्ञानी माना जाता है। इसके अलावा मेयर चुनाव की दावेदारी में निवर्तमान मेयर आशु वर्मा, क्षेत्रीय महामंत्री एवं पंजाबी समाज के चेहरे अशोक मोंगा, भाजपा के वरिष्ठ नेता जगदीश साधना, भाजपा के पूर्व संयोजक एवं सौम्य चेहरे सरदार एसपी सिंह, किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष राजा वर्मा, वरिष्ठ नेता बृजपाल तेवतिया, भाजपा महिला मोर्चा की पूर्व राष्ट्रीय सचिव आशा शर्मा, सीनियर नेता पृथ्वी सिंह कसाना, सांसद प्रतिनिधि संजीव शर्मा, अशोक गोयल, पार्षद राजेंद्र त्यागी, साहिबाबाद से पार्षद सरदार सिंह भाटी, युवा नेताओं में गौरव गर्ग सहित कई नाम सुर्खियों में हैं। देखते हैं दावेदारी की दौड़ कौन सबसे बड़ा खिलाड़ी बनकर आएगा। फिलहाल दौड़ अंदर खाने हैं बाहर कुछ भी नजर नहीं आ रहा।

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